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शब्दार्थ * श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर ते तहां उ० आये उ आकर स० श्रमण भ भगवन्त म० महावीर को 400
दनाकर न नमस्कार कर व बोले इ० इच्छता हूं भं० भगवन् तुतुपारी अआज्ञा होते मा०एकमास की भि. भिक्षु १० प्रतिमा उ० अंगीकार कर वि. विचरने को अ० यथामुखम् मा० मत प. प्रतिबंध करो त० तब खं० खंदक अ० अनगार सः श्रमण भ. भगवन्त म. महावीर से अ• आज्ञामिलते ही
एक्कारस अंगाई अहिजइ, आहिजइत्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ२त्ता समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ नमसइत्ता एवं वयासी इच्छामिणं भंते ! तुझेहि अब्भणुण्णाए समाणे मासियं भिक्खुपडिम उवसंपाजित्ताणं विहरित्तए अहासुहं देवाणुप्पिया ! मापाडबंध. तएणं से खंदए अणगारे समणेणं भगवया महावीरेणं
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 4889
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दूसरा शतकका पहिला उद्देशा
भावार्थ
अग्यारह अंग का अध्ययन किया. अध्ययन करके श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी की पास आये. आकर तीन वार प्रदक्षिणा करके वंदना नमस्कार किया. वंदना नमस्कार करके ऐसा बोले कि अहो भगवन् ! आपकी आज्ञा होवे तो एक मास की भिक्षु प्रतिमा अंगीकार करने को इच्छता अहो देवानुप्रिय ! नुम को जैसा सुख होवे वैसा करो. विलम्ब मत करो. इस तरह भगवन्त की आज्ञा मीलने से खंदक अनगार हृष्ट तुष्ट चित्तवाला बनकर भगवन्त को नमस्कार कर एक मास की भिक्षु प्रति
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