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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
०३. अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
( जीव अ० अनंत ने० नारकी भत्रग्रहण से अ० आत्मा को सं० योजे ति० तिर्यच म० मनुष्य दे देव (अ० अनादि अ० अनंत दी० दीर्घकाल चा० चतुर्गति सं० संसार कं० कतार में अ० परिभ्रमण करे से० वह किं० कैसे पं० पंडित मरण पं० पंडित मरण दु०दोप्रकार का पा० पादोपगमन भ० भक्तप्रत्याख्यान पा० पादोपगमन दु० दोप्रकार नी० नीहारिम अ० अनीहारीम नि० निश्चय अ० प्रतिक्रमण रहित से० तिरिय मणुदेव अणाइयंचणं अणवदग्गं दीहढं, चाउरंत संसारकंतारं अणुपरियदृइ. सेतं बालमरणेणं मरमाणे वढ्ढइ । सेत्तं बालमरणे ॥ से किं तं पंडियमरणे ? पंडियमरणे ! दुविहे प ० ० ( ग्रंथ संख्या १००० 1) पाओवगमणेय भत्त पच्चक्खाणेय । से किं तं पाओगमणे ? पाओवगमणे ! दुविहे पण्णत्ते, तंजहा- नीहारिमेय, अनीहाहै व अनादि अनंत चतुर्गतिक संसार में पर्यटन करता है. इसलिये बाल मरण से संसार की वृद्धि होती है. { पंडित मरण क्या है ? पंडित मरण के दो भेद कहे हैं. १ पादोपगमन अर्थात् वृक्ष की गिरी हुई शाखा की तरह अपने शरीर को स्थिर करे २ भक्त प्रत्याख्यान सो जीवन पर्यंत अशनादि चारों आहार का त्याग करे. उसमें से प्रथम पादोपगमन के दो भेद कहे हैं ? नीहारिम सो नगरमें मरे. उन के शरीर का ( निहारन ( संस्कार ) होवे और २ अनीहारिम. पर्वतादिक में करे. उन के शरीर का निहारन ( संस्कार ) होवे नहीं. पादोपगमन मरण मरने वाला प्रतिक्रमण नहीं करता है क्यों कि वह हलन चलनादि क्रिया
* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्याला प्रसादजी *
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