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14. ठिईएवि णवरं ठिईए अंतोमुहुत्त मन्भहियाई ण भण्णंति, सेसं जहा एएसि चैत्र
पढमुद्देसए आव अणंतखुत्तो ।। एवं सोलससुवि जुम्मेसु ॥ 'सेवं भंते ! भंतेत्ति ॥ ४० ॥ २ ॥ पढम समय कण्हलेस कडज़म्म २ सणिपंचिंदियाणं भंते ! कओ उववजंति ? पढमसमय उद्देसए तहेव गिरवसेसं, वर-तणं भंते ! जीवा कण्हलेस्सा ? हंता कण्हलेस्सा, सेसं तहव ॥ एवं सोलमसुवि जुम्मसु ॥ सेवं भंते! भंतेत्ति ॥ एवं एएवि एक्कारस उद्देसगा कण्हलस्मासए पढम ततिय पंचमा सरिस
गमगा, सेसा अटुवि सरिसगमगा ॥ सेवं भंत ! भंतात्त ॥ वितियं सयं सम्मचं ॥ एक ममय उत्कृष्ट तेतीस सागरोमय व अंत मुहूर्त अधिक, ऐसे ही स्थिति का कहना. परंतु अतर्मुहून अधिक कहना नहीं, शेष इस के पहिला उद्देशा मे कहना यावत् अनंतवक्त. उत्पन्न हुवा ऐसे ही सोलह युग्मों में
. अहो भगवन्! आप के वचन सत्य है.॥४०॥२॥ * ॥अहो भगवन्! प्रथम समय कृष्ण लेश्या वाले कृत युग्य २ संझी पंचेन्द्रिय कहां से उत्पन्न होने हैं ! यो प्रथम समय का उद्देशा कहा वैसे ही विशेषता रहित कहना. यों सोलह युग्मों में कहना. अहा भगवन् आप के वचन सत्य हैं यों कृष्ण लेश्या के शतक में अग्यारह उद्देशे कहना. जिन में पहिला, तीसरा व पांचव सरिखा और शेष आठ भी सरिखे कहना. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य है. यह दसरा शतक संपूर्ण हुवा.॥ ४० ॥२॥
अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
.प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वाचापसादजी.