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शब्दार्थ
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4883 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
पिंगलक नि० निग्रंथ वे० वैशालिक सा० श्रवण करनेवाला इ. इस अ० आक्षेप पु० पूछा मा० मागध कि० अ० अर्थ स. समर्थ हैहां अ० है त० तब से वह खं०खंदक क०कात्यायन गोत्रीय भ० भगवान् गो. गौतम को एक ऐसा व० कहा से वह के० कौन गो० गौतम त० तथारूप णा• ज्ञानी त• तपस्वी जे० जिससे त• तुमने ए० यह अर्थ म० मेरा र० रहस्य ६० शीघ्र अ. कहा ज० जिससे तु.११ | तुम जा जानते हो त० तब भ० भगवान् गो० गौतम खं• खंदक क० कात्यायन गोत्रीय को ए. ऐसाई
वएणं इणमक्खेवं पुच्छिए मागहा ! किं सअंतेलोए, एवं तंचेव जेणेव इहं तेणेव हव्व मागए: सेणूणं खंदया : अटे समढे ? हंता अस्थि ॥ तएणं से खंदए कच्चायणसगोत्ते भगवं गोयमं एवं वयासी-से केसिणं गोयमा ! तहारूवे णाणीवा, तवस्सीवा,
जेणं तव एसअटे मम ताव रहस्सकडे हल्वमक्खाए, जओणं तुमं जाणासि तएणं होती है ? उस का उत्तर नहीं आने से तुम महावीर भगवन्त की पास से सुनने को आये हो. अहोईल स्कंदक क्या यह सत्य है ? स्कंदकने उत्तर दिया की हां यह सत्य है. तब कात्यायन गोत्रीय स्कंदकने । पुछा कि अहो गौतम ! ऐसा कौन तथारूप ज्ञानी व तपस्त्री है कि जिनोंने मेरे मन का रहस्य तुम को कहा? अहो स्कंदक! मेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक धर्मगुरु श्री श्रमण भगवंत केवल ज्ञान केवल दर्शन
दूसरा शतकका पहिला उद्दशा-4280
भाव
को