________________
२७२
शब्दार्थAक० कात्यायन गोत्रीय तं० उनकी पास ह० शीघ्र आ० आया त० तब भ० भगवान गो० गौतम खं०
०७१ खंदक क०कात्यायन गोत्रीय अनजदीक आ० आयाहुवा जा जानकर खि०शीघ्र अ० उठकर खिशीघ्र प०
सन्मुख जाकर जे. जहां खं० खंदक क कासायन गोत्रीय तेतहां उ०आकर खं० खंदक क. कात्यायन गोत्रीय को एक ऐसा व० बोले हे. अहो खं० खंदक सा स्वागतम स० सुस्वागतं अ० योग्य आगमन सा स्वागतम् अ० योग्य आगमन से वह तुम को खं० खंदक सा० सावत्थी न० नगरी में पिं० __णं भगवं गोयमे खंदयं कच्चायणसगोत्तं अदूरमागयं जाणेत्ता खिप्पामेव अब्भु
तुइ २ त्ता, खिप्पामेव पच्चुगच्छइ पच्चुगच्छइत्ता जेणेव खंदए कच्चायणसगोत्ते तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता खंदयं कच्चायणसगोतं एवं वयासी हेखंदया ! सागयं खंदया ! सुसागयं खंदया ! अणुरागयं खंदया ! सागयमणुरा
यं खंदया ! सेणूणं तुमं खंदया, सावत्थीए णयरीए पिंगलएणं नियंठेणं वेसालियसाभावार्थ स्कंदक परिव्राजक की सन्मुख गये, और सन्मुख जाकर स्कंदक परिव्राजक को ऐसा बोले अहो स्कंदकई
तुह्मारा आगमन श्रेष्ट है, तुम्हारा आगमन अनुपम है, तुम्हारा आगमन शोभन व अनुपम है. अहो स्कंईदक! श्रावस्ती नगरी में श्री महावीर के वचन सुनने को रसिक पिंगलक नामक निग्रंथने क्या ऐसे प्रश्नों पूछे थे कि अंत सहित लोक है, या अंत रहित लोक है, यावत् किस मरण से संसार की वृद्धि व हीनता
बालब्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
wwwwwwwwwwwwwwww
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसाद जी *
naaranamama