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1.अमोलक ऋापनी
हवं भणिय, एवं गीलंलेरस अभवसिद्धियः संयं, णवरं पत्र उद्देसगा परिम अचरिम : 1 . उद्देसगवजं, सेंसं तहेव ॥ णवंम एमिंदिय सयं सम्मत्तं ॥ ३३ ॥ ९॥ . . . *
एवं कण्हलस्स अभवसिंडिय एगिदिय सपि ॥ दसमं एगिदियं सयं ॥३३॥१॥
णीललेस्स अभवसिद्धिय एगिदिएहिं सयं ॥३३॥११॥ * काउलेरस अभवसिडिय } सयं ॥३३॥१२॥ * एवं चत्तारि अभवसिद्धिया सयाणि णव २ उद्देसगा भवति । 18 एवं एताणि बारसवि एगिदिय सयागि भवंति ॥तेत्तीसइभ सयं सम्मत्तं ॥ ३३ ॥ भावार्थडे हैं पृथ्वी काया यावन् वनस्पति काया यों जैसे भवमिद्धिक का शतक कहा वैसे ही अभवसिद्धिक- का
क.कहना. परंतु, यहांपर चरिम व अचरिम में दो उद्देशा कहना नहीं. नव. उद्देशे ही कहना ॥ यो नववा एकेन्द्रिय शतक संपूर्ण हु॥३३॥९॥ * ॥ एसेही कृष्ण लेश्या अभवसिद्धिक कहना यो दशवा एकन्द्रिय शतक संपूर्ण हुया ॥ ३३ ॥ १०॥ . * . । यो नील लेया का एकोन्द्रिय शक संपूर्ण दुवा यो अग्यारहवा एकेन्द्रिय शतक संपूर्ण हु॥ ३३ ॥ ११॥ * ॥ ऐसे ही कापोत लेश्या वाले अभवीसीद्धक का कहना. यों बारहवा एकेन्द्रिय शतक हुवा. ॥ ३३ ॥ १२॥ *: यो चार अभत्रसिद्धिक शतकों में नवर उद्देशों कहना. यो सबमीलाकर एकोन्द्रिपके बारह शतक हुए ॥३३॥ खि तेंतीसवा शतक समाप्तम् ॥ .....
प्रकाशक राजावहादुर लोला सुखदेवसहायजी-ज्वालामसादजी
अनुवादक-बालब्रह्मचा