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शब्दार्थ दिशा में छ. छत्रपलाश चे० चैत्य हो० था व० वर्णन युक्त स० श्रमण भ० भगवान् म. महावीर उ०१
उत्पन्न णा ज्ञान दर्शन युक्त जा० यावत् स० समवसरण १० परिषदा नि० निर्गता ॥६॥ ती• उस क. करंगला न० नगरी की अ० नजदीक सा० सावत्थी ना० नामकी न० नगरी हो० थी व० व त० तहां सा० सावत्थी १० नगरी में ग. गर्दभाली का अं० अंतेवासी खं० खंदक ना० नामका क० कासायन गोत्रीय ५० परिव्राजक प० रहता है रि० ऋग्वेद ज० यजुर्वेद सा० सामवेद अ० अथर्ववेद इ०१
छत्तपलासए णामं चेइए होत्था, वण्णओ । तएणं समणे भगवं महावीरे उप्पन्नणाण दसणधरे जाव समोसरणं परिसा निग्गया ॥ ६ ॥ तीसेणं कयंगलाए नयरीए अदूरसामंते सावत्थीणामं नयरीहोत्था. वण्णओ तत्थणं सावत्थीए णयरीए गद्दभालिस्स
अंतेवासी खंदए नाम कच्चायणसगोत्ते परिवायगे परिवसइ रिउन्वेय, जजुब्वेय, साममें चंपा नगरी का वर्णन कहा है वैसा कहना. उस कयंगला नामक नगरी के बाहिर उत्तरपूर्व-ईशान कौन में छत्र पलाश नामक यक्षका दैत्य है, उस का भी वर्णन उववाइ से जानना. वहांपर केवल ज्ञान
केवल दर्शन के धारक श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी पधारे. परिषदा वंदन करने को आइ. भगवन्त से। ० धर्मकथा सुनकर परिषदा पीछी गई. ॥ ६ ॥ उस कयंगला नगरी की पास एक सावत्थी नामकी नगरी
थी. उम का वर्णन भी उववाइ में से जानना. उस सावत्थी नगरी में गर्दभाली नामक तापस का
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 8800
488183 दूसरा शतक का पहिला उद्देशा
भावार्थ
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