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शब्दाथ
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अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी
कहना ज. जिभलिये स० असक्त नु० शुभाशुभ क० कर्म से त• इसलिये स०सत्व व कहना ज. जिस-3 लिये ति० तिक्तक० कटक क० कषाय अं. अंबट म. मधुर र० रस जा० जाने तक इसलिये वि. विज्ञई व० कहना वे वेदता है सु-सुख दु० दुःख ० त०इसलिये के. वेदक २० कहना से० वह ते• इसलिये जा० यावत् पा० प्राण जा. यावत् वे वेद व० कहना ॥ ३ ॥ म० मृतभोजी नि० निग्रंथ नि० रुंधा भ० भव नि० रुंधा भ० भवविस्तार जा. यावत् नि० पूरा हुवा अ० अर्थ कार्य नो० नहीं पु० फीर इ. यहां
सिया, जम्हा सत्ते सुहासुहेहिं कम्मेहिं तम्हा सत्तेवि वत्तव्वं सिया, जम्हा तित्त, कटु, कसाय अंबिल महुरे रसे जाणइ, तम्हा विष्णुतत्ति वत्तव्वं सिया, वेदेइय सुहदुक्खं तम्हा वेदेतिवत्तव्वं सिया, से तेणटेणं जाव पाणेति वत्तव्वंसिया, जाव वेदेतिवत्तव्वांस
या ॥ ३ ॥ मडाईणं भंते ! नियंठे निरुद्ध भवे निरुद्ध भवपवंचे जाव निट्ठियट्ठ . कअर्थात् प्राणों को धारन करता है और उपयोग लक्षणरूप जीवत्व वैसे ही आयुः कर्म को अनुभवता है इस लिये जीव कहाता है. वह शुभाशुभ कर्म में आसक्त अथवा समर्थ है इसलिये सत्व कहाता है, वह तिक्त, कटुक, कषाय, अम्बट व मधुर रस को जानता है इस लिये विज्ञ कहाता है और सुख दुःख को वेदनेशला होने से वेदक कहाता है. इस लिये अहो गौतम ! वह प्राण यावत् वेदक कहाता है ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! मासुक भोजन करनेवाले वैसे ही भव व भव प्रपंच का निरूंधन करनेवाले यावत् निष्टि है.
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहाय जी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ