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शब्दार्थ
सूत्र
भावार्थ
वेदक व० कहना पा० प्राण भू० भूत जी० जीव स०
वि० विज्ञ वे वेदक
(स० सत्र वि० विज्ञ वे व कहना से वह के कैसे पा० प्राण जा० यावत वे० वेदक व० कहना ज० जिसलिये आ० श्वास लेता ॐ है पा० विशेष श्वासलेता है उ० उश्वासलेता है नि० निश्वासलेता त इसलिये पा० प्राण व० कहना ०ज० जिसलिये भू० हुवा म० होता है भ० होगा त० इसलिये भू० भूत व कहना ज० जिसलिये जी० जीव जी० जीता है जी० जीवपना आ० आयुष्य क० कर्म उ अनुभवे स० इसलिये जी० जीव व० सिया. पाणे भूये जीवे सत्ते त्रिष्णूवेदेति वत्तन्वंसिया ॥ से केणट्टेणं पाणेति तव्यंसिया जाव वेदेतिवत्तव्वंसिया ? जम्हा आणमंतिचा पाणमंतिवा, उस्ससंतिवा, निस्ससंतिवा, तम्हा पाणेतिवत्तव्यंसिया । जम्हा भूए भवइ भविस्सइ, तम्हा भूएतिवत्तब्वंसिया, जम्हा जीवे जीवइ जीवत्तं आउयं च कम्मं उवजीवइ तम्हा जीवेति वत्तव्यं( विस्तार का अंत नहीं करनेवाला यावत् अपूर्ण प्रयोजन की करणीवाला निर्ग्रय पुनः मनुष्यादि गति में आता है. अहो भगवन् ! जो ऐसा निग्रंय मनुष्यादि गति में आता है उन को क्या कहना ? अहो गौतम ! उन को प्राण, भूत, जीव, सत्व, विज्ञ व वेदक कहना. अहो भगवन् ! किस कारन से उन को प्राण, भूत यावत् वेदक कहना ! अहो गौतम ! वह श्वासोश्वास लेता है इस लिये प्राण कहाता है, वह अतीत काल में था, वर्तमान में है और आगामिक में होगा इस लिये भूत कहाता है, वह आत्मा जता
२०३९० पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र -
*9-408 दूसरा शतक का पहिला उद्देशा
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