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सूत्र
शब्दाथ रा० राजगृह न नगर हो' था व वर्णनपुतना सामील पधारे पर परिषदा कि निर्गता था
धर्म क. कहा ५० परिपदा प० प्रतिगता ॥ * ॥ ते. उसकाल ते. उस समय में जे० ज्यष्ट अं. अंतेवासी जा. यावत् प० पूजते प० ऐसा वबोले जे० जो वे० वेइन्द्रिय ते० तेइन्द्रिय चः चतुरेन्द्रिय पं. पंचेन्द्रिय जी. जीव ए० उनका आ. श्वास पा० विशेष श्वास उ. उश्वास नि० निश्वास जा. जानते हैं पा० देखते हैं जे. जो पु. पृथ्वी काया जा. यावत् २० वनस्पति काया ए. एकेन्द्रिय जीव
नगरे होत्था, वण्णओ सामीसमोसढे, परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा पडि
गया ॥ * ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं जेट्रे संतेवासी जाव पञ्जरासमाण एवं ___ वयासी जे इमे भंते : बेइंदिया, तेइंदिया, चउरिंदिया, पंचेंदिया जीवा एएसिणं आणा
मंवा, पाणामंवा, उस्सासंवा, निस्तासंवा जाणामो, पासामो जे इमे पुढविकाइया भावार्थ
महावीर स्वामी सव परिवार सहित पारे, यथोचित अनुज्ञा ग्रहण कर बगीचे में विराजित हुए, परिषदा वदंन को आई, और श्री भगवन्त पे धर्म मुनकर पीछीगइ ॥2॥ उस काल उस समय में भगवन्त श्री महावीर स्वामीके ज्येष्ट अंतेवामी श्री गौतम स्वामी सेवा पर्युपासना करते ऐना बोले कि अहो भगवन में
बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चतुरेन्द्रिय व पंचेन्द्रिय इन जीवों का श्वासोश्वाम मैं जानता हूं यावत देखता हूं असर्थात बस जीव का श्वासोश्वास मैं जानता हूं व देखता हूं, परंतु पृथ्वीकायादिक जीव की प्रागनादि।
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
* प्रकाशक-राजाबहादुर लामा मुख देवसहाय नी मालापनादजी *