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महररसोत्ति ॥ ३२ ॥ अणंतपएसिएणं भंते ! खंधे कक्खडफासपजवेहिं किं कडजम्मे पुच्छा ? गोयमा ! सिय कडजुम्मे जाव सिय कलिओगे ॥ अणंत पएसियाण भंते ! खंधा कक्खडफासपज्जवहिं किं कडजुम्मा पुच्छा ?गोयमा! ओघादेसेणं सिय कडजुम्मा जाव सिय कलिओगा।विहाणादेसेणं कडजुम्मावि जाव कलिओगावि॥ एवं मउय गुरुय । लहुयावि भाणियन्या॥ मीय उसिणा,णिड लुक्खा जहा वण्णा ॥३३॥ परमाणुपोग्गलाणं भंते ! किं सअड्डे अणड्डे ?गोयमा! णो सअड्डे अणड्डे ॥ दुपदसिए पुच्छा ? गोयमा!
सअड्डे, णाअणद्वे ॥ तिपदेसिए जहा परमाणु पोग्गले ॥ चउप्पदेसिए जरा दुपदेसिए ॥३२॥ अहो भगवन् ! अनंत प्रदेशिक स्कंध कर्कश स्पर्श से क्या कृतयुग्म है वगैरह पृच्छा, अहो गौतम ! सामान्य से स्यात् कृतयुग्म यावत् स्यात् कलियुग्म है. ऐसे ही अनंत प्रदेशिक स्कंध पर्यंत कहना. अहो भगवन् ! अनंत प्रदेशिक स्कंध कर्कश स्पर्श पर्या से क्या कृतयुग्म है पृच्छा, अहो गौतम
सामान्य से स्यात् कृतयुग्म यावत् स्यात् कलियुग्म. विधानादेश मे कृतयग्म यावत् कलियुग्म है ऐसे ही 3मृदु गुरु. व लघु का कहना. शीत, ऊष्ण, स्निग्ध व रूक्ष का वर्ग जैप कहना. ॥ ३३ ॥ अहो भगवन् !
परमाणु पुगल अर्ध सहित है या अर्ध रहित है ? अहो गोतम ! परमाणु पुद्गल सार्थ नहीं है परंतु अन
A8+ पंचमांग विवाह पञ्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 48
पञ्चासना शतक का चौथा उद्दे
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