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शब्दार्थ
4. अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
जी• जीवस० सत्व वे० वेदनावे. वेदते हैं व० कहना से वह क कैसे भं. ए. ऐसा गो० गौतम ज.. जो अ० अव्यतीर्थिक ए० ऐसा आ० कहते हैं जा० यावत् वे वेदना वे० वेदते हैं व० कहना ते. वे ए. ऐसा आ० कहते हैं मि० मिथ्या ते वे ए. ऐसा आ० कहते हैं अ० मैं गो• गौतम ए. ऐसा आ०१
दुक्खं, अकजमाणकडं दुक्खं अकटु अकट्ट पाणभयजीवसत्ता वेदणं वेदंतित्ति है वत्तव्वं सिया ॥ से कहमेयं भंते एवं ? गोयमा ! जण्णं ते अण्णउत्थिया एवमाइ
क्खंति जाव वेदणं वेदति वत्तव्वंसिया,जे ते एवमाहंसुमिच्छंते एवं आहंसु. अहं पुण गोयमा! एवमाइक्खामि ४, एवं खलु चलमाणे चलिए जाव निजरिजमाणे णिजिण्णे दो
परमाणु पोग्गला एगयओ साहणंति, कम्हा दो परमाणु पोग्गला एगयओ भूत है वह क्रिया क्या करण आश्री दुःख के हेतु भूत है या अकरण आश्री दुःख के हेतु भूत है ? वेड अकरण आश्री दुःख के हेतु भूत है परंतु करणं आश्री दुःख के हेतु भूत नहीं है. ऐसे ही नहीं किया है हुवा दुःख, नहीं स्पर्शा हुवा दुःख, व अक्रियमाण किया हुवा दुःख किये विना प्राण भूत, जीव व सत्व वेदना वेदते हैं. अहो भगवन् : ऐसा जो अन्य तीथिक कहते हैं वह किस तरह से है ? अहो गौतम ! जो अन्य तीर्थिक उक्त बातों को कहते हैं वे मिथ्या बोलते हैं अर्थात् उन का कथन मिथ्या है. परंतु अहो गौतम ! मैं ऐसा कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं कि चलने लगे कर्म पुद्गलों को चले कहना, यावत्
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजा ज्वालाप्रसादजी*
भावार्थ