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________________ शब्दार्थ २३८ सूत्र अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी , अ० अन्यतीर्थिक भं० भगवन् ए. ऐसा आ० कहते हैं जा० यावत् प० प्ररूपते हैं च० चलते को अ०. नहीं चला जा. यावत् नि निर्जरते को अ० नहीं निर्जरा दो० दो प० परमाणु पुद्गल ए० एकत्रित नई नहीं सा० मीले क. कैमे दो दो ५० परमाणु पुद्गल को न० नहीं है सि० स्निग्धपना त• इसलिये दो दो प० परमाणु पुद्गल ए. एकत्रित न० नहीं सा० मीले ति तीन ५० परमाणु पुद्गल ए० एकत्रित मा०मीले क० कैसे ति तीन प. परमाणु पुद्गल ए. एकत्रित मा० मीले ति तीन प० परमाणु पुद्गल अण्णउत्थियाणं भंते ! एव माइक्खंति जाव परूवंति एवं खलु चलमाणे अचलिए जाव निजरिजमाणे आनिजिण्णे दो परमाणु पोग्गला एगयओ न साहणंति, कम्हा दो, परमाणु पोग्गलाणं णत्थि सिणहकाए तम्हा दो परमाणु पोग्गला एगयओ न साहणंति ॥ तिण्णि परमाणु पोग्गला एगयओ साहणंति, कम्हा तिण्णि परमाणु पोग्गला एगयओ नववे उद्देशे में अस्थिर कर्म का विषय कहा. उम में कुतीर्थिक प्रवर्तते हैं मो आगे बतलाते हैं. कितनेक अन्य तीथिक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि जो कर्म जीव प्रदेश से चलने लगे उसे चले कहना नहीं यावत् निर्जरने लगे उसे निर्जरे कहना नहीं क्यों की वर्तमान काल को अतीत काल नहीं कह सकते हैं; परंतु जो संपूर्ण पुद्गल चलित हुवे होवे तब चले और निर्जरित हुवे होवे तव निर्मरे कहना, और वे ऐमा कहते हैं कि दो परमाणु पुद्गल एकत्रित्र स्कन्धपने मीले नहीं क्यों कि मीलने में जो स्निग्धपने का प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावाथ *
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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