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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
९० अनुवादक- बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
१० प्रतिबंध क० करो त त का कालाससित पुत्र अ अनगार थे० स्थविर भ० भगवान् को दं (वंदनकर न० नमस्कारकर चाट चार महावत घ० धर्म में पं० पांच महाव्रत स० प्रतिक्रमण सहित धर्म उ० अंगीकार कर वि० विचरता है का कालामंत्रसित पुत्र अ० अनगार ब० बहुत व० वर्ष सार साधु पर्याय पा० पाली पा० पालकर ज० जिसलिये की० करे न० नम्र भाव मुं० मुडभाव अम्लान करना नहीं अ० दंत प्रक्षालन नहीं अ० छत्र नहीं अ० उपानह रहित भू० भूमि शैय्या फ० पाटशैय्या क० काष्ट शैय्या के केशलोच बं० ब्रह्मचर्य प० परगृह प्रवेश ल० प्राप्त अ० अप्राप्त उ० ऊंच नीच गा० इन्द्रिय समुह बा० बावीस पः परिषह उ० उपसर्ग अ० महन त० इसलिये आ० आरायागं पाउणइ पाउणइत्ता, जस्सट्ठाए कीरइ नग्गभावे मुंडभावे, अन्हाणयं, अदंत ध्रुवणयं, अच्छन्तयं, अणोवाहणयं, भूमिसेज्जा फलहसेज्जा, कटुसेजा, केसलोओ, बंभ चेरवासो, परघरप्पवेसो, लढावलद्वी, उच्चावया गामकंटया, बावीसं परीस होव सग्गा विर भगवन्त बोले की ज्यों तुम्हारा आत्मा को सुख होवे वैसे करो ऐसा कार्य में प्रतिबंध [ विलंब ]} मत करो तब कालासवेशित पुत्र अनगारने स्थविर भगवंत को वंदना नमस्कार किया; वंदना नमस्कार करके चार महाव्रत रूप धर्म में से प्रतिक्रमण सहित पांच महात्रत रूप धर्म अंगीकार कर विचरने लगे. तब उन कालासवेशित पुत्र अनगारने बहुत कालतक साधु की पर्याय का पालन
किया. और पालन
करके जिस लिये नवपना, मुंड भाव, स्नान नहीं करना, दंत प्रक्षालन नहीं करना. छत्र व उपानद रहित
* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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