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+ पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूष +8
सागरोबमाइं दोहिं पुन्बकोडीहिं अब्भहियाई उक्कोसेणं छावाटुं सागरोधमाई चउहिं पुचकोडीहिं अब्भहियाइं एवइयं जाव करेजा ॥ ७ ॥ सोचेव जहण्णकालठिईएसु उववण्णो सव्वे व लद्धी संवेहोवि तहेव सत्तमगम सरिसो ॥८॥ सोचेव उक्को सकालठिईएसु उबवण्णो ‘सव्वेव लही जाव अणुबंधोत्ति, भवादसेणं जहणेणं तिण्णि भवग्गबणाई, उक्कोसेणं पंचभवग्गहणाई, कालादसेणं जहण्णेणं तेत्तीसं सागरोबमाइं दोहिं पुल्चकोडीहिं अब्भहियाई उक्कोसेणं छावटुिं सागरांवमाई. तिहिं पुवकोडीहिं अब्भहियाइं, एवइयं कालं जाव करेजा ॥ ४३ ॥
जइ मणुस्सेहितो उववजंति किं सण्णि मणुस्सेहिंतो उववजंति यावत् भवादेश. स्थिति जघन्य उत्कृष्ट पूर्व क्रोड कालादेश से जघन्य बाबीस सागरोपम दो पूर्व क्रोड आधिक उत्कृष्ट छासठ सागरोपम चार पूर्व क्रोड अधिक इतना यावत् करे. वही जघन्य स्थितिवाली नरक में उत्पन्न हुवा लब्धि, संवेध वगैरह सातवा गमा कहना, वही उत्कृष्ट स्थिति से उत्पन्न हुवा लब्धि यावत् अनुबंध पूर्वोक्त जैसे कहना. भवादेश से जघन्य नीन भव उत्कृष्ट पांच भव कालादेश से जघन्य तेत्तीस सागरापप, दो पूर्व फोड अधिक. उत्कृष्ट छाप्तठ सागरापम तीन पूर्व कोड अधिक. इतना काल यावत् करे ॥ ४३ ॥ई
* चौवीसवा शतक का पहिला उद्देशा 42