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शब्दाथ
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4. अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
स्थविर भ० भगवन्त को व वंदनकर न० नमस्कारकर ए. ऐसा व कहा ए. यह भ० भगवन् प०पद में पु० पुहिले अ० जाना नहीं अ० सुना नहीं अ० बोध नहीं अज्ञान नहीं अ० देखा नहीं अ० सुना नहीं अ० स्मरण नहीं किया अ. विज्ञान हुवा नहीं अ.गुरुगम नहीं हुवा अ० व्यवच्छेद नहीं हुवा अ० सुखाव बोध नहीं है अ० धारा नहीं ए. यह अर्थ णो० श्रद्धे नहीं नो० प्रतित कीये नहीं णो० रुचे नहीं इ. अब भं० भगवन
सदहाहि अजो, पत्तियाहि अजो, रोएहि अजो, सेजहेयं अम्हे वयामो ॥ तएणं से कालासोसिय पुत्ते अणगारे थेरे भगवंतो वंदइ नमसइ वंदित्ता नमंसइत्ता एवं वयासी-इच्छामिणं भंते ! तुब्भे अंतिए चाउज्जामाओ धम्माओ पंच
महब्बइयं सपडिवामणं धम्मं उवसंपजित्ताणं विहारत्तए ? । अहासुहं देवाणुप्पिया इन पदों का इस प्रकार के अर्थ का ज्ञान नहीं था, मैंने उम का स्वरूप नहीं पहिचानाथा, मैंने पहिले किसी की पास ऐसा श्रवण नहीं कियाथा. मुझे ऐसी प्रतीति नहीं हुईथी; मुझे ऐसा साक्षात्कार नहीं हुया था, मुझे ऐसा गुरुगम नहीं हुवा था, मेरा संदेह इस प्रकार किसीने नहीं मीटाया था, मुझे ऐसा सुखाव बोध नही हुआ था, मैंने इस प्रकार ऐमा धारण नहीं किया था, मैं इस प्रकार इसे नहीं श्रद्धता था, मुझे ऐमा रुचिकर नहीं हुआ था, अब अहो भगवन ! इन का अर्थ मैंने जाना है, ज्ञान से बोधित हुवा है, सम्यक्त्व से विस्तृत अर्थावबोधवाला हुआ है विशपकर धारन किया है, मर्वथा प्रकार से संदेह दर हुआ
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* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ