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भावार्थ |
4 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
वेमाणिया । णवरं अभिलावो चुलसीतिओ ॥ एएसिणं भंते ! सिद्धाणं चुलसीति समजियाणं णो चुलसीति समज्जियाणं चुलसीतिएय । चुलसीतिएय समज्जियाणं कयरे कयरे जाव विसेसाहिया बा ? गोयमा ! सव्वत्थोवा सिद्धा चुलसीतिय णो चुलसीतिय समजिया, चुल सीतिय समज्जिया अणंतगुणा, णो चुलसीतिय समाजिया अनंतगुणा ॥ सेवं भंते ! भंतेत्ति जात्र विहरइ || वीसइमस्स दसमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ २० ॥ १० ॥ वसिइमं सयं सम्मतं ॥ २० ॥
(जिक हैं. इन सब की अल्याबद्दल वैमानिक पर्यंत छक्क जैसे कहना. परंतु यहां पर चौरामी कहना. अहो भगवन् ! चौरासी समार्जित, नो चौरासी समार्जित और चौरासी नो चौरासी समार्जित सिद्ध इन में कौन किसने अल्पवहुत यावत् विशेषाधिक है? अहो गौतम! सबसे थोडे सिद्ध चौरासी नो चौरासी समार्जित इन से चौरासी समार्जित अनंतगुना इन से नो चौरासी समार्जिन अनंतगुना. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं. यह बीसवा शतक का दशवा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥२०॥१०॥ यह वी सत्रा शतक समाप्त हुवा ॥२०॥
* प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेव महायजी ज्वालाप्रमादजी *
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