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शब्दाथा
8 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
क० कैसे भं० भगवन् जी० जीव ग. गुरुत्व को ह० शीघ्र आ० आते हैं गो० गौतम पा० प्राणातिपात से मु० मृषावाद से अ० अदत्तादान मे० मैथुन ५० परिग्रह को क्रोध मा० मान मा० माया लो०३ लोभ पे० राग दो० द्वेष क० कलह अ० कलंक चडाना पे० चुगली र० रति अ० अरति प० परपरिवादी
| २१० मा० कपट मि. मिथ्यादर्शन शल्य ए० ऐसे ख० निश्चय जी० जीव ग. गुरुत्व को ह• शीघ्र आ• आते हैं ॥ १ ॥ भं० भगवन् जी० जीव ल. लघुत्व ह० शीघ्र आ० आते हैं गो० गौतम पा० प्राणातिपात
कहणं भंते ! जीवा गरुयत्तं हव्वमागच्छंति ? गोयमा! पाणाइवाएणं, मसावाएणं, आदिन्न, मेहुण, परिग्गह, कोह, माण, माया, लोह, पेज, दोस, कलह, अब्भक्खाण, पेसन्न, रति, अरति. परपरिवाए, मायामोल, मिच्छादसणस्मल्लेणं, एवं खलु गोयमा ! जीवा गरुयत्तं हन्धमागच्छति ॥ १ ॥ कहण भंत ! जीवा लहुयत्तं हब्बमागच्छंति ?
आठवे उद्देशे के अंत में वीर्य का वर्णन किया है, और जीव वीर्य से भारी होता है इसलिये आगे गुरुत्व का आधिकार चलता है. अहो भगवन् ! अधोगति गमनरूप गुरुत्व किस तरह से जीव प्राप्त करे? अहो गौतम ! १ प्राणातिपात-जीव का अतिपात से, २ मृषावाद-असत्य बोलने से ३ अदत्तादान-चौरी करने से ४ मैथुन से ५ परिग्रह ६ क्रोध ७ भान ८ माया ९ लोभ १० राग ११ द्वेष १२ कलह १३ ॥ अभ्याख्यान-कलंक चडाने से १४ पैशुन्य-चुगली करने से १५ रति अरति १६ परपरिवाद अन्य काई
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालापसादजी *
भावार्थ
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