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प्रयोजक बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनी
+२६९ अठारापापके त्याग से अकर्कश वेदनी९.१४ । २८२ नेरीये के पापकर्म दुःख हेतृभूत ९४०
२७० जीव दया से साता वेदनी कर्म बन्धे. ९१५ २८३ नर्क की दश प्रकार की क्षेत्र वेदना ९ १२७१ जीव को दुःख देने से दुःखपाव. ९१६ २८४ हस्ति कुंथुवे की सरीखी क्रिया ९४२ ११७२ छठे आराका वर्णन.
सप्तम शतक का-नववा उद्देशा. ९४ सप्तम शतक का-सातवा उद्देशा. ९२८
२८५ साधु के वैक्रय करने का कथन ९४ २७३ संबृत साधु भी अनाउपयोगसे इया वही
२८६ कोणिक चेडाका महा सिला कंटक सं.९४५ क्रियाकरे.
२८७ कोणिक चेडा का रथकुशल संग्राम ९५४ ७४ काम भोग रूपी अरूपी-व भेदों. ९२९
२८८ शकेन्द्र कोणिक के पूर्व के मित्र ...९५ १२७५ चौबीस दंडक कामी भोगी का प्रश्न. ९३१
२८९ संग्राम में मरे वे देवता होवे वरूनाग. ९८ २७५ छद्मस्त देवता हो भोग भोगने समर्थ है ९३४ २७६ आवधी ज्ञानी,परम अवधी.केवल ज्ञानी९३५
सप्तम शतक का-दशवा उद्देशा. ९७ २७७ असज्ञी अकाम वेदना वेदते हैं ? ९३६ | २९० अन्य तीथिक की चर्चा आस्तिकाया ७२
२७८ सज्ञी अज्ञानता से निकरण वेदना वेदते ९३८ २९१ पापकर्म पुण्यकर्म परिणमने का दृष्टांत १८२ । सप्तम शतक का-आठवा उद्देशा. ९३९
२९३ अग्नि प्रजालने से बुझानेवाला अल्पकर्मी ९८५ २७९ छमस्त सिद्ध न होवे
२९४ अचित्त पुद्गलों का प्रकाश तेजोलेश्वा ९८८ २८. हस्ति कुंथवे का सरीखा जीव ९४० अष्टम शतक का-प्रथमोहेशा. .९९० २८१ दश संज्ञा चौवीस दंडक पर ९४० । २९५ प्रयोगसा, मिसा, विशेष पुद्गलोंका कथन९९०
प्रकाशक राजाबहादुर काला सुखदेवसहायजी-ज्वालाप्रसादजी.