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पंचमांग विवाहपण्णति ( भगवती ) मूत्र
__किंचि आणत्तंबा णाणत्तंवा एवं जहा इंदियउद्देसए पढमे जाव वेमाणिया जाव
तत्यणं जे ते उवउत्ता ते जाणंति पासंति आहागेति, से तेण?णं णिक्खवा भाणिपव्वो ॥ ८ ॥ कइविहेणं भंते ! बंधे पण्णत्ते ? मागंदियपुत्ता! दुविहे बंधे पण्णत्ते तंजहादवबंधेय भावबंधेय ॥ ९ ॥ दव्वबंधेणं भंते ! कइविहे पण्णत्ते मागदियपुत्ता ! दुविहे पण्णत्ते, तंजहा-पओगबंधेय वससाबंधेय ॥ १० ॥ वीससाबंधणं भंते !
कइविहे पण्णत्ते, मागंदियपुत्ता ! दुविहे पण्णत्ते तंजहा-सादीयवीससाबंधेय अणारहे हुने हैं ? हां माकंदिय पुत्र ! भावितात्मा अनगार को यावत् अवगाह कर रहे हुवे हैं ॥७॥ अहो । भगवन् ! छमस्थ मनुष्य उन निरित किय इवे पुदगलों तथा उन के भेद वर्णादि विशेष पदलों वगैरह जैन पन्नाणा पद में पहिले उद्देश में कहा वैसे ही यहां पैमानिक पर्यंत जाना. यावत् वहां जो उपयोग युक्त है वह जाने देखे व आहार करे वहां न कहना. अहो माकंदिय पुत्र! इसलिये ऐसा कहा है ॥८॥ अहो भगवन् ! यंध के कितने भेद कहे हैं ? ओ माकंदिय पुत्र! बंध के दो भेद कहे हैं. १ द्रव्य बंध और २ भाव बंध ॥ ९ ॥ अहो भगा! दो पर हैं? अहो गौतम ! द्रव्य
के दो भेद कहे हैं. १ प्रयोग बंध और पी.साध ॥१०॥ अहं भगान! वीसना बंध के
___48 अठारहवा शतक का तीसरा उद्देशा-2020
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