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- पंचमांग विवाहपण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
णो अचरिमे, सेस ठाणेसु जहा आहारओ । अभवसिद्धीओ सव्वत्थ एगत्त पुहत्तेषं णो चरिमे अचरिमे, णो भवसिद्धीय णो अभवसिद्धीय, जीवा सिद्धाय एगत्तपुहत्तेणं जहा अभवसिद्धीओ ॥ २८ ॥ सण्णी जहा आहारओ, एवं असण्णीवि, णो सण्णी णो असण्णी जीवपदे सिद्धपदेय अचरिमो, मणुस्सपदे चरिमो, एगत्त पुहत्तेणं ॥ ३० ॥ सलेस्सो जाव सुक्कलेस्सा जहा आहारओ णवरं जस्स जा अत्थि, अलेस्सा जहा णो सण्णी, णो असण्णी ॥ ३१ ॥ सम्मदिट्ठी जहा अणाहारओ, मिच्छट्ठिी आहारओ, सम्मामिच्छट्ठिी एगिदिय विगलिंदियवजं सिय चरिम है परंतु अचरिम नहीं है क्यों की भव्यसिद्धिक अवश्य मे मोक्ष जावेंगे. शेष सब स्थान आहारक जैसे कहना. अभवीसद्धिक मव स्थान एक अनेक आश्री चरिम नहीं है परंतु अचरिम है. नो भव्यमिद्धिक नोअभव्यसिद्धिक जीव व सिद्ध में एक अनेक आश्री अभव्य सिद्धिक जैसे कहना. ॥ २१ ॥ संज्ञी असंज्ञी का आहारक जैसे कहना. नो संज्ञो नो असंज्ञी जीवपद में व सिद्धपद में एक अनेक आश्री अचरिम व मनुष्य पद में चरिम कहना. ॥ ३०॥ सलेशी यावत् शुक्ल लेशी का अपनी २ लेश्या सहित आहारक जैसे कहना. अलेश्या का नोसंज्ञी नोअसंज्ञी जैसे कहना. ॥३१॥ समदृष्टि का अनाहारक मिथ्यादृष्टि का आहारक और सममिथ्यादृष्टि का एकेन्द्रिय
62 अठारहवा शतकका पहिला उद्देशान
भावार्थ