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॥ ६ ॥ जीवाणं भंते ! किं अत्तकडं वेदर्ण वेदेति, परकडं वेदणं वेदेति तदुभयकडं वेदणं वेदेति ? गोयमा जीवा अत्तकडं वेदणं वेदेति, णो परकडं वेदणं वेदेति, णो तदु. भयकडं वेदणं वेदेति. एवं जाव वैमाणियाणं ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ सत्तरसमस्सय चउत्थो उद्देसो सम्मत्ती ॥ १७ ॥ ४ ॥ • कहिणं भंते ! ईसाणस्स देविंदस्स देवरण्णो सभा सुहम्मा पण्णत्ता ? गोयमा ! जंबूहीवे दीने मंदरस्स पन्बयस्स उत्तरेणं, इमीसेणं रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमाण
जाओ भूमिभागाओ उर्दू चंदिम जहा ठाणपदे जाव मझे ईसाण-डिंसए सेणं भावार्थ ही दंडक का जानना ॥६॥ अहो भगवन् ! जीव क्या आत्म कृत वेदना वेदते हैं यावत् उभय कृत वेदना
वेदते हैं ? अहो गातन ! जीव आत्म कृत वेदना वेदते हैं. परकृत व उभयकृत वेदना नहीं वेदते हैं.. है. ऐसे ही वैमानिक पर्यंत कहना. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं. यह सतरहवा शतक का
चौथा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥ १७ ॥ ४ ॥
ई चौथे उद्देशे में वेदना का अधिकार कहा. साता बेदनीय कर्मवाले देवता होते हैं इसलिये साता. 1 वेदनीय का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! ईशान नामक देवेन्द्र देवराजा की सुधर्मा सभा कहा हैं ?
49. अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी.
* प्रावक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.
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