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________________ शब्दार्थ | सूत्र भावार्थ पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र +-* } कानतक उ० बाण को आ०खींचकर चि०खडारहे अ० अन्य कोई पु०पुरुष म० पीछेसे आ० आकर स० अपने पा० हस्त से अ० असिसे सी० शीर्ष छिं० छेदे से ० वह उ० वाण ता० उस पु० पूर्वाकर्षण से तं० उस मि मृगको वि० विंधे से वह भ० भगवन् पु० पुरुष किं मि० मृग वैरसे पु० स्पर्शा पु० पुरुष वे० वैरसे पु० स्पर्शा गो० गौतम जे ० जो मि० मृगको मा० हने से० वह मित्र मृगौर से पु० स्पर्शा जे० जो पु० पुरुष को मा० हने से ० वह पु० पुरुष वैरसे पु० पर्शा से वह के० कैसे मं० भगवन् ए० ऐसा बु० कहा आयय कणाययं उसे आयामेत्ता चिट्टिज्जा. अन्नयरे पुरिसे मग्गओ आगम्म सयपाणिणा असिणा सीसं छिंदेज्जा, सेय उसू ताएचेव पव्यायामणयाए तंमियं विधेजा । से भंते ! पुरिसे किं मियवेरेण य पुढे पुरिसवेरेणं पुट्ठे ? गोयमा ! जमियं मारेइ, सेमिरेणं पुट्ठे, जे पुरिसं मारेइ से पुरिसवेरेणं पुट्ठे । सेकेणट्टेणं भंते! एवं वुच्चइ अहो भगवन् ! कच्छ यावत् वनदुर्ग में मृग का वध के लिये कोई पुरुष धनुष्य में वाण रखकर कान पर्यंत प्रत्यंचा खींच कर खडारहें; उतने में पीछे से अन्य कोई पुरुष आकर अपने हस्त में खङ्गलेकर उस मृग (वधक का मस्तक छेड़े. उस समय उस मृग को उदेशकर खींचा हुवा बाण उस पुरुष के हस्त में से छुटकर उसी मृग को भेदे. अब अहो भगवन् ! उस मस्तक छेदनेवाला पुरुष को क्या मृग का वैर हुआ अथवा पुरुष का वैर हुआ ? अहो गौतम ! जिसने पुरुष को मारा उस को पुरुष का वैर हुवा और जिसने * पहिला शतक का आठवा उद्देशा २०१
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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