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भावार्थ |
+- पंचमात्र विवाह पण्णाति ( भगवती ) सूत्र 438+
अहम्मंसिवा धम्माधम्मंसिवा चक्किया केइ आसइतएवा जाव तुयट्टित्तएवा ? णो इट्टे समट्ठे ॥ से केणट्टेणं खाइ अटुणं भंते ! एवं बुच्चइ जाव धम्माधम्मेट्ठिए ? गोमा ! संजय विरय जाव पावकम्मे धम्मेट्ठिए धम्मंचेव उवसंपजित्ताणं विहरइ, असंजयपात्र कम्मे अहम्मेट्ठिए अहम्मंचेव उवसंपजित्ताणं विहरइ, संजया संजए धमाधम धमाधम्मं उवसंपजित्ताणं विहरइ, से तेणट्टेणं गोयमा ! जात्र ट्ठिएं २ ॥ जीवाणं भंते ! किं धम्मेट्ठिया अहम्मेट्ठिया धम्माधम्मेट्ठिया ? गोयमा !
॥
कोई बैठने को, उठने को यावत् सोने को क्या समर्थ है ? अहो गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है. क्योंकि धर्म व धर्म रूप है. भान ! किन कारन में ऐसा कहा गया है कि संयति धर्म में स्थित है यावत् संयतासंयति धर्मावर्त में स्थित है ? अहो मौन ! म से पाकर्म का
{ करनेवाले विरति संयति धर्म में स्थित हैं और धर्म का ही आश्रय ग्रहण कर विचरते हैं. असंयति अधर्म में { स्थित रहते हैं और अधर्म का ही आश्रय ग्रहण कर विचरते हैं वैसे ही मयतान्यति धर्माधर्म में स्थित हैं? और धर्माधर्म का आश्रय ग्रहण कर विचरते हैं. इसलिये ऐसा कहा गया है यावत् धर्माधर्म में } || २ || अहो भगवन् ! बहुत जीत्र क्या धर्म या धर्माधर्म में
में
स्थित हैं अधर्म में स्थित हैं
4- सत्तरहवा शतक का दूसरा उद्देशा +2+
स्थित हैं। स्थित हैं ?
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