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सरीरणिव्वत्तिएमाणा कइकिरिया ? गोयमा ! तिकिरियावि चउकिरियावि पंच किरियावि, ॥ पुढवीकाइयावि ॥ एवं जाव मणुस्सा ॥ एवं वेउब्विय सरीरेणाधि दोदंडगा, णवरं जस्स अस्थि वे उब्वियं एवं जाव कम्मग सरीरं ॥ एक सोइंदियं जाव फासिंदियं ॥ एवं मगजागं वइजोगं कायजे.मं, जरा जं अस्थि तं माणियव्यं, एते एगत्तपत्तेणं छब्बीस दडगा ॥ १६ ॥ कइविहेण भंते ! भाव पपणते? गोयमा ! विहे भावे पण्णत्ते, तंजहा- उदइए उवसमिए जाब सजिवाइए ॥ सेकिंतं उदइए भावे ? उदइए भावे दुवहे पण्णत्ते, तंजहा-आदएय उदयणिप्पण्णेय । एवं एएणं ॥१५॥ अहाँ भगवन् ! उदारिक शरीर बनाने वाले जीवों को कितनी क्रियाओं लगे. ? अहो मौतम !! तीन चार पांच क्रियाओं लगे ऐसे ही पृथ्वी काय यावत् मनुष्य का जानना. ऐसे ही वैक्रय शरीर के भी एक जीव व अनेक जीव आश्री दो दंडक कहे .शिषता इतनी कि जिन को जितने शरीर हैं उ उसने कहना. ऐने ही कार्माण शरीर तक. कहा. ऐसे ही श्रेन्द्रिय यावत् सन्द्रिय का जानना, मनयोगी, वचन योगी काया योगी का भी वैसे ही जानना. ॥१६॥ अहो भगवन् ! भाव के कितने भेद कहे हैं? अहो गौवम भाव के छ भेद कई हैं आदमिक भाव, पीपक भाव यावत मनिकातिक भाव. अहो ।
48:00 सत्तरहरा शतक का पहिला उद्देशा
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