________________
जाव पंचहि किरियाहिं पुट्टा ॥ ७॥ अहेणं भंते ! से मूले अप्पणो गुरुयत्ताए जाव जीवियाओ ववरोवेइ तएणं से पुरिसे कह किरिए ? गोयमा ! जावं चणं मूले अप्पणो जाव ववरोवेइ तावं चणं से पुरिसे काइयाए जाव चउहि किरियाहिं पुढे, जेसिपिणं सरीरहितो कंदे णिवत्तिए जाव बीए णिव्वत्तिए तेविणं जीवा काइयाए जाव चउहिं किरियाहिं पुटा ; जेसिंपियणं जीवाणं सरीरेहितो मूले णिव्वत्तिए तेविणं
जीवा काइयाए जाव पंचहि किरियाहिं पट्टा, ॥ ८ ॥ जेवियणं से जीवा अहे वीसभावार्थ
यहां लग वह पुरुष कायिकादि पांच क्रियाओं से स्पर्धाया हुवा है. जिन जीवों के शरीर से मूल यावत् बीज बना हुवा है उन को भी कायिकादि पांच क्रियाओं लगती है ॥ ७॥ अहो भगवन् ! वृक्ष के मूल अपनी मुहता से नीचे भावे यावत् प्राणों को जीवित से पृथक् करे तब उस पुरुष को कितनी क्रियाओं
लगे ? अहो गौतम ! जहां लग अपनी गुफा से यावत् जीवित से पृथक् करता है वहांलग वह पुरुष Eकायिकादि चार क्रियामों से स्पीया हुवा है. जिन जीवों के शरीर मे कंद यावत् बीज बना हुवा है। * जीवों को भी कायिकादि चार क्रियाओं लगती हैं और जिन जीवों के शरीर से मूल बना हुवा है
उन जीवों को कापि कादि पांच क्रियाओं पर्श हुई ॥८॥ स्वभाव से नीचे आते मार्ग में जो जीवों
48 अनुवादक-बालबमचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी.