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________________ २२२९ शब्दार्थ 4 मेरु पर्वत की मं० मेरु की चू० चूलिका उ० पर सा० सिंहासनपे अ० स्वनः को सु० स्वप्न में पा०देखकर ५० जाग्रत हुवे ॥ १४ ॥ ज० जो स० श्रपण भ. भगवंत म. महावीर ए. एक म. बडा घो: घररूप । दिदिप्ति धारन करने वाला पिः पिशाव सु० स्वर में पराजित किया पा० देखकर १० जाग्रत हु। कतं. इम से स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर ने मो. मोहनीय क० कर्म मृ० मूल में घा० क्षय किया : जं. जो स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर ए. एक म० दडा मु. शुक्ल प. पांखवाला पु० पुस्को किल स० स्वप्न में पा० देखकर प. जाग्रत हुवे तं• इस संस० श्रण भ. भगवंत म. महावीर सु० | महं मंदरे पव्वएणं मंदर चूलियाए उवरि सीहारुणदरम्यं अप्पाणं सुविणे पासित्ताणं पडिबुद्धे ॥ २४ ॥ जंणं रूमणे भगवं महावीरे गं महं घोररूवं दिवधरं तालपिसायं मुविण पराजियं पासित्ताणं पडिबद्ध तणं समणेणं भगवया महावीरेणं मोहणिजे कम्मे मूलओ घातिओ जंणं समणे भगवं महावीरे एगं महं सक्किलं जाव पडिबई, तंणं समणे भगवं महावीरे सुझाणोरगए विहाइ जंण समणे भावार्थ हुवा देखकर जग्रत हुए और १० एक बडा लक्ष योजन का ऊंचा मेरु पनि की चालीस योजन की ऊंची चूलिकाप सिंहासन पर अप रूयं विराजमान हुए ऐसा देखकर जाग्रत हुवे ॥ २४ ॥ अब उक्त दश स्वप्नों का क्या फल हुआ सो कहते हैं. जो श्रमण भगवंत महावीर पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 42.मोलहवा शतक का छठा उद्दशा * * 48 ।
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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