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48 पंचांग विवाह पणचि ( भगवती ) मूत्र
उवागच्छइ २ ता छत्ताइच्छत्ते तित्थगरादि पासइ, एवं जहा उदायणे जाव सयमेव आभरणे उमुयइ, उमुयइत्ता सयमेव पंचमुट्ठियं लोयं करेइ, करेइत्ता जेणेव मुणिसुन्वए अरहा एवं जहा उदायणे तहेव पन्नइए ॥ १८ ॥ तहेव एक्कारस अंगाई अहिजइ, जाव मासियाए संलहणाए सर्द्धि भत्ताइ अणसणाए जाव छेदेइ, छेदेइत्ता आलोइय पडिक्वंते समाहिपत्ते कालमास कालकिच्चा महासुक्के कप्प महासामाणे विमाणे उववाय सभाए देवसयणिजंसि जाव गंगदत्तदेवत्ताए उववणे ॥ १९ ॥ तएणं से गंगदत्ते । देवे अहुणोक्वण्णमेत्तए समाणं पंचविहाए पजत्तीए पज्जत्तिभावं गच्छइ, तंजहा
आहारपजत्तीए जाव भासामणपजत्तीए एवं खलु गोयमा ! गंगदत्तेणं देवेणं सा दिल्या पंच मुष्टि लोच किया. मुनि सुव्रत अरिहंत की पास आया. और उदायन राजा. जैसे मुंडित यावत् प्रवइजित हुवा ॥ १८ ॥ फीर अग्यारह अंगों का अध्ययन कर एक मास की संलेखना से साठ भक्त अनशन का छेदन कर आलोचना प्रतिक्रमण व समाधि सहित काल के अवमर में काल कर महा शुक्र देवलोक में महामामानिक विमान में उपपात सभा में देवशय्या में यावत् गंगदत्त देवतापने उत्पन्न हुवा ॥ १९ ॥ वह गंगदत्त देव महार पर्याप्ति यावत् भाषा मन पर्याप्ति ऐसी पांच पर्याप्ति से अभी ही पर्याप्त भाव को प्राप्त
२० 48सोलहवा शतक का पांचसा उद्देशा