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सूत्र
(भगवती) सूत्र पंचमांग विवाह पण्णतिं (भग
अरहा गंगदत्तस्स गाहावइस्स तीसेय महति जाव परिसा पडिगया ॥१७॥ तएणं से गंगदत्ते गाहावई मुणिसुव्वयस्स अरहओ अंतियं धम्मं सोचा णिसम्म हट्ट तुट्ठ उठाए उट्टेइ, उढेइत्ता मुणिसुव्ययं अरहं वंदइ णमंसइ २ ता एवं वयासी-सद्दहामिणं भंते ! णिग्गंथं पावयणं जाव से जहेयं तुब्भे वदह जं · णवरं देवाणुप्पिया ! जेट्टपुत्तं कुडुंबे ठावेमि ॥ तएणं अहं देवाणुप्पियाणं अंतिथं मुंडे जाव पन्वयामि ॥ अहामुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंध॥ १७ ॥ तएणं से गंगदत्ते गाहावई मुणिसुत्रएणं अरहा
एवं वुत्ते समाणे हट्ठ तुट्ठ मुणिसुव्वयं अरहं वंदइ णमंसइ बंदइत्ता णमंसइत्ता मुणि पदेश सुनाया. यावत् परिषदा पीछी गई ॥ १७ ॥ गंगदत्त गाथापति श्री मुनिसुव्रत अरिहंत के वचन
कर हृष्ट तुष्ट हुवा, और अपने स्थान से उठकर मुनि सुव्रत अरिहंत को वंदना नमस्कार कर बोला अहो भगवन् ! मैं निग्रंथ के प्रवचन श्रद्धता हूं. यावत् जैसे आप कहते हैं वैसे ही हैं. विशेष में ज्येष्ट पुत्र को कुटुम्ब में स्थापकर मैं आप की. पास मुंडित होवूगा यावत् दीक्षा अंगीकार करूंगा. अहो देवा नुप्रिय! तुमको जैसे सुख होवे वैसा करो बिलंब मत करो ऐना मुनिसुव्रत सामीने कहा।।१७॥ जब मुनिसुव्रत अरिहंतने ऐसा कहातब वह गंगदत्त गाथापति हृष्ट तुष्ट हुवा और मुनिमुव्रत अरिहंत को बंदना नमस्कारकर
30- सोलहना शतक, का. प्रचिवा उद्दशा.
भावार्थ
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