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शब्द. 4 में जा. यावत् णो नहीं म० महापर्यवसान वाले भा होते हैं ॥ ६॥ से अथ ज• जैसे के० कोई
पु. पुरुष अ० एरण आ० तोडते म०पडे जा. यावत् णां• नहीं प० पर्यवसानवाले भ० ॥७॥त. तरुण ब. बलवंत जा० यावत् मे० बुद्धिमान णि. णिपुण सि. शिल्प में ए. एक भ. वडा स० शाल्मली का गं. जड उ० भीना अ० जटा गहित अ० गांठों रहित अ. चिक्काप्त राहत अ० खराव दुरू से बना स० धारवाला अ० तीक्ष्ण प० कुहाडा से अ छदे त० तब से वह म० बढे २ स० शब्द क.al
गाढीकयाई, चिकणी कयाई एवं जहा छ?सए जाव णो महापज्जवसाणा भवंति॥६॥ से जहा णामए केइ पुरिसे अहिगरणे आउंडमाणे महता जाव णो पज्जवसाणा भवंति ॥ ७ ॥ से जहा णामए केइ पुरिसे तरुणे बलवं जाव मेहावी णिपुणसि प्पोवगए एगं महं समालगंडियं उल्लं अजडिलं अगंट्टिल्लं अचिक्कणं अवाइई
सपत्तियं अतितिक्खेण परसुणा अकम्मेजा, तएणं से पुरिसे णो महंताई २ सद्दाई भावार्थ शतक में कहा वैसा यावत् महापर्यवसानवाले नहीं हैं ॥ ६ ।। और भी जैसे कोई पुरुष लोह कारादिक की
एरण कूटते उस का विनाश बहुत कठिनता से कर सकते हैं वैसे ही नरक में रहे हुवे नारकी कमों का अंत भी नहीं कर सकते हैं ॥ ७ ॥ और भी जैसे तरुण, बलवंत, यावत् बुद्धिमान सत्र कारिगरि में निपुण ऐसा कोई पुरुष एक बड़ा हग, जटा, व गांठों रहित चिकास विना का एक बड़ा एरंडादि वृक्ष
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *