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शब्द
सूत्र
भावार्थ
{० नारकी का आ० आयुष्य प० बांधे ति० तिर्यच म० मनुष्य दे० देव भा० आयुष्य प० बांधे ने० नारकी का आ० आयुष्य कि० करक ने नरक में उ० उत्पन्न होवे ति० निर्यच म० मनुष्य दे० देव आ० आयुष्य कि० करके दे देवलोक में उत्पन्न होवे || १ || ए० एकान्त पं० पंडित भं० भगवन् म० मनुष्य किं० क्या ने० नारकी का आ० आयुष्य प० बांधे जा० यावत् दे० देव का आ० आयुष्य कि० करके दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम ए० एकान्त पं० पंडित म० मनुष्य आ आयुष्य लोएस उववज्जइ ? गोयमा ! एगंत बालेणं मणुस्से नेरइयाउयं पिपकरेइ, तिरिमणुदेवापि पकरेइ, । नेरइयाउयंपि किच्चा नेरइएस उववज्जइ, तिरिमणुदेवायं किदेव उवजइ ॥ १ ॥ एगंत पंडिएणं भंते! मणुस्से किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवायं किच्चा देवलोएसु उववज्जइ ? गोयमा ! एगंत पंडिएणं मस्से आउ के आयुष्य का बंध कर के देवलोक में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त बाल मनुष्य नारकी, तिर्यच मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है वैसे ही नारकी, तिर्यच मनुष्य व देवता के आयुष्य बंध 1610 कर नारकी, तिर्यच, मनुष्य व देवता में उत्पन्न होता है. ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! एकान्त पंडित मनुष्य क्या नरक, तिर्यच, मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है ? और नरक का आयुष्य बांध कर नरकमें } उत्पन्न होता है यावत् देवता का आयुष्य वांधकर देवता में उत्पन्न होता है ?
अहो गौतम ! एकान्त
48 पंचांग विवाह पण्णति ( भवगती ) सूत्र
+++ पहिला शतक का आठवा उद्देशा 4
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