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शब्दार्थ
अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
गौतम जी जीव अ. अधिकरणी भी से० अथ के• कैसे में भगवन् ए०. ऐसा बु० कहागया जी० : जीव अ० अधिकरणी भी अ. अधिकरण भी गो० गौतम अ. अविरति १० आश्री से० अथ ते. इसलिये जा. यावत् अ० अधिकरण भी शेष सरल शब्दार्थ
गरणी अहिगरणं ? गोयमा ! जीवे अधिगरणीवि अधिगरणंपि ॥ से केणट्टेणं भंते ! एवं वुच्चइ जीवे अधिगरणीवि अधिगरणंपि ? गोयमा ! अविरतिं पडुच्च से तेणटेणं जाव अधिगरणंपि ॥णेरइएणं भंते ! किं अधिगरणी अधिगरणं ? गोयमा !
अधिगरणीवि अधिगरणंपि ॥ एवं जहेव जीवे तहेव णेरइएवि ॥ एवं णिरंतरं जाय । जीव अधिकरणी है या आधिकरण है ? अहो गौतम ! जीव अधिकरणी भी है और अधिकरण भी है. अहो भगवन् ! किम कारन से जीव अधिकरणी भी है और अधिकरण भी है ? अहो गौतम ! आरति होने से बाह्य शस्त्र का मालिक सो अधिकरणी और शरीरादि शस्त्र रूप परिणपने से अधिकरण है. इस लिये जीव अधिकरणी भी है और अधिकरण भी है. अहो भगवन् ! नारकी क्या अधिकरणी है या आधकरण है ?. अहो गौतम ! जैसे समुच्चय जीव का कहा ऐसे ही नारकी पर्यंत सब
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*
भावार्थ
१ अधिकरण को धारक. २ शस्त्र.