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शब्दार्थी को का• कायिकादि जा. यावत् पा. प्राणातिपातकि क्रिया पं० पांच से पु० स्पर्शाया जे. जिन जी
जीवों के म० शरीर से अं० लोहा बना सं. संडासबनी च. हथोडीवनी मु. लघुघन अ० अधिकरणि*
अ. अधिकरणी रखने का बना उ० पानी की दोनी अ० लोहकार शाला बनी ते वे जी. जीव पं. | पांच कि० क्रिया से पु० स्पर्शे ॥ ४॥ जी. जीव भं० भगवन अ० अधिकरणी अ.
चणं से पुरिसे अयं अयकोट्ठाओ जाव णिक्खिवइत्ता तावंचणं से पुरिसे काइयाए जाव पाणाइवाय किरियाए पंचहि किरियाहिं पुढे, जेसिपियणं जीवाणं सरीरोहितो अयणिव्वत्तिए संडासए णिव्वत्तिए, चम्मेटुए णिव्वत्तिए, मुट्ठिए णिव्वत्तिए अधिगरिणी णिव्वत्तिए अधिगणिखोडी णिव्वत्तिए, उदगदोणी अधिगरणसाली णिव्वत्तिया
तेवियणं जीवा काइयाए जाव पंचहि किरियाहिं पुट्ठा ॥ ४ ॥ जीवेणं भंते ! अधिभावार्थ
लगे ? अझे गौतम! जहां लग वह पुरुष लोह के कोठे में से लोहेको लोहे की संडासी से नीकाल कर एरण . में डाले अथवा नीकले वहाँलग उस पुरुष को कायिकादि पांच क्रियाओं लगती हैं और जिन जीवों के शरीर से लोहा बना है, लोहमय संडास बनी है, चिमटा बना है, घण बना है, एरण बनी है, एरण रखने लकडी (खोडी) वनी है, प्रज्वलित लोहे को बुझाने के लिये रखी हुई पानी की कुंडी; और लोह-21 कार की शाला बनी हुई है उन जीवों को कायिकादि पांच क्रियाओं लगती हैं ॥४॥ अहो भमषन् ।
++ पंचांग विवाह पण्णति ( भगवती ) सूत्र 48
सोलहमा शतक का पहिला उद्देशा 9881