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-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनी 80% अनुवादक
उ• मरे अ० विना स्पर्शा हुवा गो० गौतम पु० स्पर्शा हुवा उ० परे णो नहीं अ० नहीं स्पर्शा उ• मरे । मे वह कि क्या स० शरीर सहित णि नीकलता है ए. ऐसे ज. जैसे खं० स्कंदक जा० यावत । ते० इमलिय जा. यावत् णि नीकलता हैं ॥ १ ॥ ई० खीरे करने वाली भ० भमवन अ० अग्निकाय के कितना का० काल सं० रहती है गो गौतप ज० जघन्य अं• अंतर्मुहूर्त उ० उत्कृष्ट ति०तीन रा० रात्रि १ वक्कमइ ? हंता अत्थि से भंते ! किं पुढे उद्दाइ अपुढे उद्दाइ गोयमा ! पुढे उद्दाइ, ___णो अपट्टे उद्दाइ ॥ से भंते ! किं ससरीरी णिक्खमइ असरीरी णिक्खमइ
एवं जहा खंदए जाव से तेणट्रेणं जाव णो असरीरी णिक्खमइ । १ ।।
इंगाल कारियाएणं भते ! अगणिकाए केवइयं कालं संचिट्ठइ ? मोयमा ! जहणेणं बोले अहो भागवन् ! लोहे के घण मारने से क्या एरण में वायु उत्पन्न होता है ? हां गौतम ! एरण में वायु उत्पन्न होता है क्यों की वायु विना अग्नि नहीं होती है. ॥ १॥ अहो भगवन् ! क्या वह वायु समर्शी हुई मर या विना स्पर्शी हुई मर? अहा गौतम ! स्पर्शी हुइ वायु मरे परंतु विना स्पर्शी हुइ वायु मरे नहीं. अहो भगवन् ! क्या वह शरीर महित नीकलता है वगैरह जैसे स्कंदक का आधिकार कहा विमे ही यावत् इस लिये यावत अशरीरी नहीं नीकलता है वहां तक जानना ॥ १ ॥ अहो भगवन अंगार करने की अग्नि काय कितना काल पर्यंत रहती है ? अहो. गौतम ! जघन्य अंतर्मुहूर्न उत्कृष्ट
१ यहां आक्रान्त के संभव से पहिला वायू सचेतनपने उत्पन्न होवे सचेतन होजावे. ऐसा संभव होता है..
* प्रकाशक-रांजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी .
भावार्थ