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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
आर्य इ० आज से चिलम्बाकाल से गो- गोशाला पं० मंखलीपुत्र होव्था स० श्रमणघातक जा ० यावत् छ० छद्मस्थ में का० कालकिया तं० उस मू० मूल से अ० मैं अ० आर्य अ० अनादि अ० अनंत दी० दीर्घ चा० चतुर्गतिक सं० संसार में अ० पर्यटन किया । १९३ ॥ तं इसलिये मा० मत अ० आर्य तु० तुमभी के कोई भ० होवे आ० आचार्य प्रत्यनीक उ० उपाध्याय प्रयनीक अ० अपयशकारक अ० अवर्णकारक अ० अकीर्तिकारक मा० मत अ० अनादि अ अनंत सं० संसार कंतार अपर्यटन करेगा अडाए गोसाले मंखलिपुत्ते होत्था समणघायए जाव छउमत्थे चेव कालगए तं मूलगंचणं अहं अजो ! अणादीयं अणवदग्गं दीहमई चाउरंत संसारकतारं अणुपरियइ ॥ १९३ ॥ तं माणं अजो ! तुमपि केइ भवतु आयरियपडिणीए उवज्झाय पडिणीए आयरियउवज्झायाणं अयसकारए अवण्णकारए अकित्तिकारए माणं सेवि एवचेव अणादीयं अणवदग्गं जात्र संसारकंतारं अणुपरियट्टिहिति, (निर्ग्रथों को बोलकर ऐसा बोलेंगे कि अहो आर्यो ! बहुत काल पहिले मैं श्रमण का घातक मंखली पुत्र गोशाला था. यावत् छद्मस्थ में काल कर गया. वहां से मैंने अनादि अनंत दीर्घ चतुर्गतिक संसार में परिभ्रमण किया । १९३ ।। इस लिये अहो आर्यो ! तुम आचार्य उपाध्याय का प्रत्यनीक मत होवो, उन का अपयशकारक, अकीर्तिकारक, अवर्णकारक मत होवो. और इस से जैसे मैंने अनादि अनंत चतु
* प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी #
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