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शब्दार्थ
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अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
है स सर्प अ० अजगर अ० असालिया म० महोरग जा. यावत् इ० ये च• चतुष्पद विधान भ० होते.
० एकरवरवाले दादोखरवाले मं० गंडीपद सं० सन्त्रीपद इ. ये ज. जलचर की विजाति भ० होती हैं य० मत्स्य क० कच्छ जा. यावत् स० सुमुंमार ते०उन में अ०अनेक लक्षवार जा. यावत् कि० कर के जा जो इ०ये च०चतुरेंद्रिय भ० होते हैं अं० अंधिक पो पौत्रिक ज जैसे प०पन्नवणापदमें जा यावत् गो गोबर
सप्पविहाणाई भवंति, तंजहा अहीणं अयगराणं आसालियाणं महोरगाणं तेमु अनेग सयसहस्सखुत्तो जाव किच्चा इमाइं चउप्पद विहाणाई भवंति तंजहा एगखुराणं दुखुराणं गंडीपदाणं सणहपदाणं तेसु अणेगसयसहस्स जाव किच्चा, जाई इमाई जलचर विहाणाई भवंति, तंजहा मच्छाणं कच्छपाणं जाव सुंसमाराणं, तेसु अणेगसय
सहस्स जाव किच्चा जाइं इमाइं चउशिंदेय विहाणाई भवंति, तंजहा अंधियाणं चर्मपक्षी, रोमपक्षी, समुद्गपक्षी और विततपक्षी में अनेक लक्षवार दुःखित होकर उन में ही वारंवार उत्पन्न होगा. वहां सब भव में शस्त्र से हणाया हुवा काल के अवसर में काल करके गोह, नकुल वगैरह भी पनवणा पद में कहे हुवे जैसे यावत् जाहक जीव विशेष चतुष्पद में अनेक लक्षवार उत्पन्न होगा. शेष सर अधिकार खेचर जैसे जानना. यावत् मृत्यु पाकर उरपरिसर्प में होंगे. जिन के नाम अही, अजगर, अशालिया, बडा सर्प उस में अनेक लाख जन्म मरण करके चतुष्पद में उत्पन्न होंगे. जिन के
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ