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________________ २१४६ शब्दार्थ ० १.५० धर्मघोष का० वर्णन जा० यावत् सं० संक्षिप्त वि. विपुल ते तेजो लेश्या वाले. ति... तीन ज्ञान* सहित सु० मुभूमि भाग उ० उद्यान की अ० पास छ० छठ २ के अनिरंतर जा. यावत् आ० आतापना लेते वि. विचरेंगे ॥ १७८ ॥ तक तब से वह वि. विमल वाहन रा० राजा अ० अन्यदा कदापि र० रथ फिराने का० करके णि नीकला ॥ १७९ ॥ त० तब से वह वि० विमल वाहन रा० राजा सु०॥ सभभिभाग उ. उद्यान की अपास २० स्थफिराने का का करता सु० मुमंगल अ. अनगार को छ० छठ २ से जा०यावत् आ० आतापना लेते पा० देखेगा पा० देखकर आ० क्रोधित जा० यावत् मि०, सखित्तविउल तेयलेस्से, तिण्णाणोवगए सुभूमिभागस्स उजाणस्स अदूरसामंते छटुं सूत्र छट्टेणं अणिक्खित्तेणं जावं आयावेमाणे विहरिस्सइ ॥ १७८ ॥ तएणं से विमल वाहणे राया अण्णयाकयायि रहचरिउ काउंणिजाहिति ॥ १७९ ॥ तएणं से विमल है वाहणे राया सुभामिभागस्स उज्जाणस्स अदूरसामंते रहचरियं करेमाणे सुमंगलं अणगार छटुं छ?णं जाव आयावेमाणे पासिहिति, पासहितित्ता आसुरुत्ते जाव मिसि यावत् संक्षिप्त विपुल तेजोलेश्या सहित तीन ज्ञान युक्त सुभूमि भाग उद्यान की पास छठ२ के पारणे से निरंतर है भावार्थ तप से यावत् आतापना भूमि में आतापना लेते हुवे विचरेंगे ॥१७८॥ अब एकदा विमलवाहन राजा रथ फीराने के लिये बाहिर नीकलेगा ॥१७१॥ वह विमलवाहन राजा सभूमिभाग उद्यान की पास रथ * हुवे निरंतर छठ२ यावत् आतापना लेतेहुवे मुमंगल अनगारको देखेगा. देखकर वह आसुरक्त यावत् क्रोधित बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी ॐ mammmmmmmmmmmmmmmmmnainm *प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * mnnnnnnn
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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