________________
शब्दार्थ
२१११
48 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 4.92
अ० कितनेक दे० देवों की अ० अठारह साल सागगेपम की ठि० स्थिति ५० कही त• उस में स. सर्वानुभूति दे० देव की अ० अठारह मा० सागरोपम की ठि• स्थिति ५० प्ररूपी से. अब स० सर्वानु ७ भति देव ता० उस दे० देवलोक में आ० आयुष्यक्षय से जा० यावत् म. महाविदेह वा० क्षेत्र में सि०१० सीझेंगे जा० यावत् अं• अंत करेंगे ॥ १५९ ॥ ए. एसे दे० देवानुप्रिय के अं० शिष्य को० कोशल जा० देशका सः सुनक्षत्र अ° अगार ५० प्रकृाते भ० भद्रिक जा. यावत् वि. विनीत से वह मं० वण्णे ॥ तत्थणं अत्थेगइयाणं देवाणं अट्ठारस सागरोवमाई ठिई पण्णत्ता, तत्थणं सव्वाणुभूईस्सवि देवरस अट्ठारस सागरोवमाइं ठिई पण्णत्ता,सेणं सव्वाणुभूई देवे ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं ठिइक्खएणं जाव महाविदहे वासे सिज्झिहिति जाव अंतं करेहिति ॥ १९ ॥ एवं खलु देवाणुप्पियाणं अंतेवासी कोसल जाणवए सुणक्खत्ते
णाम अणगारे पगइभदए जाव विणीए सेणं भंते ! तदा गोसालेणं मंखलिपुत्तणं उत्पन्न हुआ. उस में कितनेक देवताओं की अठारह मागरांपम की स्थिति कहो. वहां पर सर्वानुभूति अनगार की अठारह सागरोपम की स्थिति कही. वह सर्वानुभूति देव वहां से आयुष्य, स्थिति व भव क्षय से चवकरके यावत् महाविदेह क्षेत्र में सिझेंगे बुझेंगे यावत् सब दुःखों का अंत करेंगे ॥ १५९ ॥ अहो । भगवन ! आपके अंतेवासी प्रकृति भद्रिक यावत् विनित कोशल देश के मुनक्षत्र अनगार मंखली पुष ।
*8484848 पमरहबा शतक 48
भावार्थ
.