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________________ शब्दार्थ जागा 14 जा० देशका स० सर्वानुभूति अ० अनगार प० प्रकृति भद्रिक जा. यावत् वि. विनीत से वह भ०: भगवन् त उस समय गो. गोशाला मं. मंखलीपुत्र के त. तपतेज से भा० भस्म कराया क. कहाँ है Eग० गया क. कहां उ० उत्पन्न हवा ए. ऐसे गो. गौतम म मेरा अंशिष्य पा. पूर्वदिशा का स० सर्वानुभूति अ० अनगार १० प्रकृति भद्रिक जा. यावत् वि. विनीत से. वह त० तब मो० गोशाला मं० मंखली पुत्र से भा० भस्मकराया उ. ऊर्ध्व चं० चंद्र सू० सूर्य जा. यावत् बं• ब्रह्मलं. लंतक म० महाशुक्र क. कल्प वी• छोडकर स. सहस्रार क० देवलोक में दे० देवतापने उ० उत्पन्न हुवा त० वहाँ पाईण जाणवए सव्वाणुभूईणामं अणगारे पगइभदए जाब विणीए सेणं भंते ! तदा गोसालेणं मंखलिपुत्तेणं तवेणं तेएणं भासरासीकए समाणे कहिंगए कहिं उवव. ण्णे ? एवं खलु गोयमा ! ममं अंतेवासी पाईणजाणवए सव्वाणुभूईणामं अणगारे पगइभदए जाव विणीए सेणं तदा गोसालेगं मंखलिपुत्तेणं भासरासीकरेमाणे उर्दू } चंदिमसूरिय जाव बंभलंतगमहासुक्के कप्पे वीईवइत्ता सहस्सार कप्प देवताए उक. भावार्थ गार मंखली पुत्र गोशाला से भस्म कराये हुवे काल के अवमर में काल करके कहां गये कहां उत्पत्र हुए। अहो गौतम ! मंखली पुत्र गोशाला से भस्म कराया हुवा मेरा अंतेवासी सर्वानुभूति अनगार चंद्र सूर्य यावत् ब्रह्म व लांतक देवलोक की उपर महा शुक्र देवलोक को उल्लंघ कर सहस्रार देवलोक में डेवतापने । 48 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी. प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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