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शब्दार्थ
सूत्र
भावार्थ
48 अनुवादक- बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
का कांक्षी पु० पुन्य का कांक्षी स० स्वर्ग का कांक्षी मो० मोक्ष का कांक्षी ध० धर्म पि० पिपासु पु० पुन्य पिपासु स० स्वर्ग पिपासु मो० मोक्ष पिपासु त० उस में चित्त वाला म० मनवाला ले० लेश्या वाला अ० अध्यवसाय वाला अ० अर्थयुक्त अ० अर्पित करण बाला उ० उस भा० भावना से भा० भावता ए० इस अं० अंतर में का० काल क० करे दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे से० वह ते इस लिये गो० गौतम } ॥ २० ॥ जी० जीव मं० भगवन् ग० गर्भ में ग० गया हुवा उ० उलटा होवे पा० पसली जैसे अं० आम्र पुण्णकंखिए, सग्गकंखिए, मोक्खकंखिए, धम्मपिवासिए, पुण्णापवासिए, सग्गपितासिए, मोक्खपिवासिए, तच्चित्ते, तम्मणे, तल्लेसे तदज्झवसिए, तदट्टोवउत्ते, तदप्पियकरणे तब्भावणाभाविए, एयंसिणं अंतरंरांस कालं करेजा देवलोएस उववज्जइ सेट्टेणं गोयमा ॥ २० ॥ जीवेणं भंते गब्भगए समाणे उत्ताणएवा, पासल्लाएवा कामी, स्वर्ग का कामी व मोक्ष का कामी; धर्म, पुण्य, स्वर्ग व मोक्षका कांक्षी; धर्म, पुण्य, स्वर्ग व मोक्ष का पिपासु, धर्मादिमें तथा प्रकारका चित्तवाला, तन्मय, तीनशुभ लेश्यावन्त, वैसेही अध्यवसाय युक्त, उस अर्थ { प्रयोजन युक्त, उसी अर्थ में आत्मा को अर्पण करनेवाला व वैसा भाव को चिन्तवनेवाला यदि उसी समय काल कर जावे तो देवलोक में देवतापने उत्पन्न होता है. इस कारन से अहो गौतम ! कितने क जीव देवलोक में उत्पन्न होते हैं और कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं ॥ २० ॥ अब
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