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शब्दार्थ
पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती ) मूत्र 4082
से ५. नीकलकर जे. जहां स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर ते० तहां उ० आकर म. श्रमण भ. भात म. महावीर को ति० तीनवार आ० आवर्त जा. यावत् १० पर्युपामना की ॥१४६ ॥ सी०१७ सिंहस० श्रमण भ. भगवंत म. महावीर मी० सिंह अ० अनगार को एक ऐसे वबोले से. अथ णू० शंकादशी सी० सिंह झा० ध्यान में व० रहते अ. यह एक ऐना जा० यावत् प० रुदन किण से० अय ते. तुझे सी० सिंह अ० अर्थ म० योग्य हैं. हां अ० है ॥ १४७ ॥ तं० इमलिये णो नहीं मी० सिंह
तेणेव उवागच्छइ उबागच्छइत्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणं २ । है जाव पज्जुवासइ ॥ १४६ ॥ सीहादि ! समणे भगवं महावीरे सीहं अणगारं एवं ।।
वयासी-स Yणं सीहा ! ज्झाणतरियाए वट्टमाणस्स अयमेयारूवे जाव परुण्णे,
से णूणं ते सीहा ! अटे समटे ? हंता अस्थि ॥ १४७ ॥ तं णो खलु सीहा ! स्वामी की पास आये और श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को. तीन बार हस्त जोडकर प्रदक्षिणा देकर वंदना नमस्कार किया यावत् पर्युपासना की ।। १४६ ॥ श्रमण भगवन महावीरने सीहा अनगार को कहा कि अहो सीहा ! तुझे ध्यान करत ऐसा अध्यवसाय हुवा यावत् रोने लगा तो क्या यह शत. सस है ? हां भगवन् ! यह बात सस है ॥ १४७॥ अहो सीहा ! मस्खली पुत्र गोशाला के तपतेज से पराभव
48488 पनरहदा शतक 88
भावार्थ
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