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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
48 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
[ अपोन १० प्ररूपते हैं ॥ १२४ ॥ तं० इस लिये ग० जा तु० तुम अ० अयंपुल ए० ऐसे त० तेरे ५० { धर्माचार्य ध० धर्मोपदेशक गो० गोशाला मं० मंखलीपुत्र इ० यह ए० ऐसा वा० प्रश्न वा करो ॥ १२५ ॥ त० तब अ० अयंपुल आ० आजीविक उ० उपासक आ० आनीत्रिक थे० स्थविरों से ए० ऐसा बु० कहाया ह० हृष्ट तु० तुष्ट उ० उठकर जे० जहां गो० गोशाला मं० मंखली पुत्र ते० वहां प० नीकला ग० जाने को ॥ १२६ ॥ त तब ते० वे आ० आजीविक थे० स्थावर गो० गोशाला मं० मंखली पुत्र को पाणए जाव तओ पच्छा सिज्झति जाव अंतं करेति ॥ १२४ ॥ तं गच्छहणं तुमं अयं पुला ! एवंचैव तव धम्मायरिए धम्मविएसए गोसाले मंखलिपुत्ते इमं एारुवं वागरणं वागरेहि ॥ १२५ ॥ तणं से अयंपुले आजीवियउवासए आजीविएहिं थेरेहिं एवं वत्समाण हट्ठ तुट्ठ उट्ठाए उट्ठेइ उट्ठेइत्ता जेणेव गोसाले मंखलिपुत्ते तेणेव पहारेत्थ गमणाए ॥ १२६ ॥ तणं ते आजीवियथेरा गोसालस्स मंखालिपुपानी से विवरते हैं; तथापि चार पान और चार अपान की प्ररूपणा करते हैं. इस में क्या पान है? यावत् सीझे, बुझे व अंत करे ॥ १२४ ॥ इस से अहो अयंपुल ! तू तेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक की पास जा और इस प्रश्न की पृच्छा कर ।। १२५ ।। आजीविक स्थावर के ऐसे कहने पर अयंपुल आजीविक दृष्ट तुष्ट यावत् आनंदित हुवा और मंखली पुत्र गोशाला की पास जाने को नीकला || १२६ ।। अब आजी
● मकाचक - राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी
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