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शब्दार्थ * ऋद्धिवंत ज०जेसे डा० हालाहला आ० आजीविक सं०मत में अ。स्वतःको भा० भावता वि० विचरता है। ११८॥ (त० तत्र अ० अयंपुल आ१ आजीविक उ० उपासक को अ० अन्यथा क० कदापि पु० पूर्वरात्रि में कुं० { कुटुंब जागरणा जा० जागते अव्यह ए० ऐसा अ० अध्यवसाय जा० यावत् स० उत्पन्न हुवा कि० कैसा सं० { संस्थानबाला ह० हल प० कहे त० तब त० उस अ० अयंपुल आ० आजीविक उ० उपासक को दो दूसरी वक्त भी एक ऐसा अ० अध्यवसाय जा० यावत् स० उत्पन्न हुवा ए० ऐसे म० मेरे ध० धर्माचार्य अप्पा भावेमाणे विहरइ ॥ ११८ ॥ तरणं तस्स अयंपुलरस आजीवियउवासअण्णाकयाई पुत्ररत्तावरत्तकालसमयांस कुटुब जागरियं जागरमाणे अयमेरूवे अज्झथिए जाव समुप्पजित्था किं संठिया हल्ला १० ? तरणं तस् अयंपुलस्स आजीवियउवासगस्स दोपि अयमेयारूवे अज्झत्थिए जाव समुप्पज्जित्था,
गस्स
सूत्र
भावार्थ
48 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
को भावता हुवा विचरता था ॥ ११८ ॥ उस समय एकदा अयंपुत्र आजीविक उपासक को पूर्व रात्रि कुटुम्ब जागरणा करते ऐसा अध्यवसाय हुवा कि हल्ला का संस्थान क्या है ? इस से दुसरी वक्त भी ऐसा अध्यवसाय हुवा कि मेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक उत्पन्न ज्ञान, दर्शन के धारक यावत् सर्वज्ञ सर्व १ गोवालिका तृण सरिखा आकारवाला कीट विशेष.
* प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहा यजी ज्वालामसादजी*
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