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शब्दार्थ
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43 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
णि निर्ग्रन्थों को किं. किंचित् आ० पीडा वि० व्यावाध छ० चर्मछेद अ० नहीं करता हुवा पा० देखकर: मो० गोशाला मं० मखलीपुत्र की अं० पास से आ० आत्मा से अ० अबक्रम कर जे. जहां स० श्रमण भ. भगवंत म. महावीर ते. वहां उ० आकर स. श्रमण भ० भगवंत म. महावीर को ति तीन बार आ० आवर्त ५० प्रदक्षिणा व वंदना कर ण. नमस्कार कर स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर को उ० प्राप्त होकर वि• विचरने लगे अ० कितनेक आ० आजीविक थे० स्थविर गो० गोशाला 40
आवाहवा वाबाहंवा छविच्छेदं वा अकरेमाणे पासई, पासइत्ता गोसालस्स मंखलिपुत्तस्स अंतियाओ आताए अवकमंति, अवकमंतित्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छंति, उवागच्छतित्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं वंदति।
णमंसंति वंदित्ता णमंसित्ता समणं भगवं महावीरं उवसंपज्जित्ताणं विहरंति अत्थेवह उन को किंचिन्मात्र बाधा, पीडा यावत् चर्म छेदकर सका नहीं. ऐसा देखकर आजीविको मत के कितनेक स्थविर मखलीपुत्र गोशाला की पास से स्वयमेव नीकल गये और श्रमण भगवंत महावीर स्वामी की पास आये. वहां महावीर स्वामी को तीन आवर्त व प्रदक्षिणा सहित वंदना नमस्कार कर श्रमण भगवंत महावीर स्वामी की नेश्राय से विचरने लगे और कितनेक मंखली पुत्र गोशाला की
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी*
भावार्थ