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शब्दार्थ /५० परिवर्तन प अंगीकार करता है पं० पांच क० कर्म स० लक्ष स० साठ स० सहस्र छ० छसो ति .तीन .
क० कशि अ० अनुक्रम से ख० खपाकर त० उस प० पीछे सि० सीझे बु• बुझे मु० मुक्त होवे प० । निर्वाण पास होने जा सक. दुःखों का अंत का किनाक करते हैं व क करेंगे से० अथ जाना (जैसे गं० गंगा म० महा नदी ज० जिससे प० बढी हुइ ज. जहां से प० नीकली. ए. यह अ० आधा ५०. पांच जो० योजन स० सो आ० लंबाइ से अ० आधा जो० योजन वि० चौडाइ से पं० पांच ध.
सत्त मणिगन्भे, सत्त पउट्ट परिहारे, पंचकम्माणिसयसहस्साई सटुिंच. सहस्साई छच्च सए तिणिय कम्मंसे अणुपुवेणं खवइत्ता, तओ पच्छा सिझंति बुझंति मुच्चंतिः । परिणिव्वाइंति सव्व दुक्खाणं मंतं करिसुवा करितवा करिस्संतिवा ॥ से. जहा वा गंगा महाणदी जओ पवढा जहिंवा पज्जुवत्थिया एसणं अद्वापंचजोअण
सयाई आघामेणं, अहजोअणं विक्खंभेणं, पंचधणुहसयाइं उव्वेहेणं एएणं गंगापभावार्थ में सीझेंगे वे सब हमारे शास्त्रानुसार वहां पर चौराप्ती लक्ष महाकल्प पर्यंत मुख भोगते हैं. ऐसे ही सात
भागवकर शरीरान्तर में प्रवेश करते हैं. सात संज्ञी गर्भान्तर पश्चात् कर्म के पांच लाख साठ हजार छ सो तीन भेद अनुक्रम से क्षय करके सिद्ध हवे, मुक्त हुये यावत् सब दुःखाका | अंत किया, करते हैं व करेंगे. अब महा कल्पका प्रमाण कहते हैं. जैसे गंगा नदी जहां से नीकलकर
अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*
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