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शब्दार्थ कवणिक का हि. हित का कामी जा० यावत् नि० निश्रेय का कामी अ० अनुकंपा से दे देवता मे स०
भंड सहित जा. यावत् सा० पहुंचाया ।। ८०॥ तं० इसलिये ग. जा तु. तुम आ. आनंद घ०धर्माचार्य ध० धर्मोपदेशक सश्रमण णा ज्ञातपुत्र को ए० यह अ० बात ५० कदे ॥ ८१ ॥ त०तब से वह आ०१४ आनंद थे० स्थविर गो० गोशाला मं० मखलीपुत्र से एक ऐसा चु० कहाया भी डरा जा० यावत् सं
भयभीत वाला गो० गोशाला मं० मंखलीपुत्र की अं० पास से ह. हालाहला कुं० कुंभकारिणी के कुं० #कुंभकार की आ० दुकान में से प० नीकलकर सि० शीघ्र तु• त्वरित सा० श्रावस्ति न० नगरी की
तेसिं वाणियाणं हियकामए जाव णिस्सेसकामए अणुकंपियाए देवयाए सभंड जाव साहिए ॥ ८० ॥ तं गच्छहणं तुमं आणंदा ! धम्मायरियस्स धम्मोवएसगस्स णायपुत्तस्स एयमटुं परिकहेहि ॥ ८१ ॥ तएणं से आणंदे थेरे गोसालेणं मंखलिपुत्तेणं एवं वुत्तेसमाणे भीए जाव संजायभए गोसालस्स मंखलिपुत्तस्स अंतियाओ
हालाहलाए कुंभकारीए कुंभकारावणाओ पडिणिक्खमइ पडिणिस्खमइत्ता सिग्धं तुरियं भावार्थ परंतु अहो आनंद ! जैसे उस देवताने अनुकंपा से हित यावत् कल्याण इच्छनेवाला उस वणिक की
86 रक्षा की थी वैसे मैं तेरी रक्षा करूंगा ॥ ८० ॥ अहो आनंद ! तू तेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक की पास जा 1 और इस बात को कहे ॥ ८१ ॥ मंखली पुत्र गोशाला से ऐसा सुनने से आनंद स्थविर डरे यावत् भय%%
438 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
34837 पन्नरहवा शतक 2880888