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शब्दार्थ
4.2 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 42
की उ० प्रधान कि० कीर्ति व० वर्ण सि० श्लोक स० देव सहित म. मनुष्य अ० असुर लोक में पु० जाते हैं गु० गोपते हैं थु० स्तुति करते हैं इ. ऐसा स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर ॥ ७९ ॥ तं. इसलिये ज. यदि मे० मुझे से वह अ० आज से कि० किंचित् व० बोले ते. इस से तक तप ते तेज से ए. एक प्रकार कू० कूट प्रहार भा० भस्म क. करेगा ज. जैसे वा० सर्प से ते. वे व० वणिक ए. एक प्रहार कू० कूट प्रहार भा० भस्म क० करुंगा ज. जैसे वा० सर्प से ते वे व० वणिक तुमारा आ० आनंद सा• रक्षण करूंगा सं० गोपन करुंगा ज• जैसे से वह व० वणिक ते० उन २०
अस्सादिए । उराला कित्तिवण्णसहसिलोगा सदेव मणुयासुरेलोए · पुवंति, गुवंति थुवंति इति खलु समणे भगवं महावीरे इति इति ॥ ७९ ॥ तं जदिमे से अज किंचि वदति, तोणं तवेणं तेएणं एगाहच्चं कूडाहचं भासरासिं करेमि जहा वा वालेणं
ते बणिया । तुम चणं आणंदा ! सारक्खामि संगोवयामि, जहा वा से वणिए, भगवंत ज्ञातपुत्र उदार पर्याय को प्राप्त हुवा है, उदार कार्ति, वर्ण, शब्द व श्लोकवाला है और सदैव मनुष्य, देवलोक में स्तुति यावत् गुणग्राम होते हैं कि श्रमण भगवंत महावीर ॥ ७९ ॥ अब आज से यदि कुच्छ कहा तो तपतेज से जैसे सर्पने वणिकों को कूटाकार समान भस्म किये, वैसे मैं भस्म करूंगा.
प्रकाशक
सक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ