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शब्दार्थ |
भावार्थ
** पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती ) सूत्र
[वि० विचरता है गो० गोशाला मं० मंखलिपुत्र अ० जिन नहीं जि० जिन प्रलापी जा० यावत् प० | कहता विविचरता है || ६४ || त० तब सा०वह म० बहुतवडी प० परिषदा ज० जैसे सि० शिव जाग्यावत्
१५० पीछी गई ॥ ६५ ॥ त० तब सा० श्रावस्ती ण० नगरी के सिं० शृंगाटक जा० यावत् ब० बहुत २०२३ { मनुष्य अ० अन्योन्य जा० यावत् प० प्ररूपते हैं दे० देवानुप्रिय गो० गोशाला मं० मंखलिपुत्र जि० जिन जिन जिन प्रलापी वि० विचरता है तं० वह मिं० मिथ्या सः श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर ए० ऐसा आ० कहते हैं जा० यावत् परं प्ररूपते हैं त० उस गो० गोशाला मं० मंखलिपुत्र का पुत्ते जिणे जिणप्पलावी जाव जिणसदं पगासमाणे विहरइ । गोसालेणं मंखलिपुत्ते अजिणे जिणप्पलावी जाव पगासमाणे विहरइ ॥ ६४ ॥ तणं सा महइ महालिया महन्त्र परिसा जहा सिदे जाव पडिगया ॥ ६५ ॥ तणं सावत्थीए णयरीए सिंघाडग जाव बहुजणो अण्णमण्णरसजाव परूवेइ जेणं देवाणुप्पिया ! गोसाले मंखलिषुत्ते जिणे जिणप्पलवी विहरइ तं मिच्छा || समणे भगवं महावीरे एवमा
(जिन जिन प्रलापी यावत् जिन शब्द प्रकाश करनेवाला नहीं है परंतु अजिन होने पर जिन का प्रलाप { करता हुवा विचरता है ॥ ६४ ॥ फीर वह बडी परिषदा पीछी गई जिस का कथन शिवराजर्षि जैसे कहना ॥ ६५ ॥ अव श्रावस्ती नगरी के शृंगाटक यावद महापथ में बहुत मनुष्यों परस्पर ऐस
- पन्नरहवा शतक 44