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________________ शब्दार्थ | सूत्र भावार्थ ७८ ॥ त० तब से अ० हुवा ते० वे स० सात ति० तिल के पु० पुष्प जीव उ० चवकर ए० इस ति० तिल के वृक्ष की ए० एक ति० तिलसींग में स०सात तिल प० उत्पन्न हुवे ए० ऐसे ख खलु गो० गोशाला व० वनस्पति काय प०परिवर्तन १प० परिहार प० परिहार होवे ॥ वह गो० गोशाला मं० मंखलिपुत्र म० मुझे ए० ऐसा आ० कहते जा० यावत् प० परूपते ए० यह अर्थ णो० नहीं स० श्रद्धे ए० इस अर्थ को नहीं श्रद्धता जे० जहां से वह ति० तिलका वृक्ष ते० तहां उ० जाकर ता० उस ति० तिलके वृक्ष गोसाला ! से तिलथंभए णिप्पण्णे णो अणिप्पण्णमेव, तेय सत्ततिल पुप्फजीवा उदाइत्ता उदाइत्ता एयस्स चेव तिलथंभगस्स एगाए तिलसंगलियाए सत्ततिला पचायाता ॥ एवं खलु गोसाला ! वणस्सइकाइया पउह परिहारं परिहरति ॥ ५८ ॥ तणं से गोसाले मंखलिपुत्ते ममं एव माइक्खमाणस्स जाव परूवेमाणस्स एयमटुं णो सद्दहति ३ एयमङ्कं असद्दहमाणे जाव अरोएमाणे जेणेव से तिलथंभए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छइत्ता ताओ तिलथंभयाओ तं तिलसंगलियं खुड्डति खुड्डित्ता करय( इस से यह तिल स्तंभ उत्पन्न हुवा है और उस की तिलफलि में पुष्प के सात तिलपने उत्पन्न हुए जीवों मर कर सात अहो गोशाला ! वनस्पतिकायिक मरकर इस में ही उत्पन्न होते हैं ॥ ५८ ॥ तब गोशाला मेरा इस कथन की श्रद्धा प्रतीति व रुचि नहीं करता हुवा उस तिल स्तंभ की पास गया 4०३ अनुवादक - बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी .. मकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * २०२०
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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