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शब्दार्थ प० सूने ॥ ५५ ॥ त० तब अ० मैं गो० गौतम अ० एकदा गो० गोशाला मं० मंखलिपुत्र की स०साथ।
कु• कूर्मग्राम से सि० सिद्धार्थ ग्राम ण नगर को स० उद्यत हुवा वि० विचरने को जा० जब मो० हम old । तं० उस दे० भाग को ह० शीघ्र आ० आये ज० जहां से वह ति० तिलकावृक्ष ॥ ५६ ॥ त० तब से०%
वह गो० गोशाला मं० मंखलिपुत्र म० मुझे एक ऐसा ३० बोला तु० तुम भं० भगवन् त० तब म० मुझे ए. ऐसा आ कहते थे जा० यावत् प० प्ररूपतेथे गो० गोशाला ए. यह ति• तिलकावृक्ष णि० उत्पन्न
गोयमा ! अण्णयाकयायि गोसालेणं मंखलिपुत्तेणं सद्धिं कुम्मगामाओ जयराओ सिद्धत्थगाम णयरं संपट्ठिए विहाराए,जाहेय मो तं देसं हव्वमागया जत्थणं से तिलथंभए ॥ ५६ ॥ तएणं से गोसाले मंखलिपुत्ते ममं एवं वयासी तुन्भेणं भंते !
तदा ममं एवं आइक्खह जाव एवं परूवेह गोसाला ! एसणं तिलथंभए णिप्पजिस्सइ अहो गौतम ! एकदा मैं मंखली पुत्र गोशाला की साथ कूर्मग्राम नगर से सिद्धार्थ ग्राम नगर में जाने को नीकला. और जहां उक्त तिलस्थंभ था वहां हम दोनों आये ॥५६॥ तब मंखली पुत्र गोशाला मुझे ऐसा बोला कि अहो भगवन् ! उस समय तुमने मुझे ऐसा कहा था कि यह तिलस्तंभ उत्पन्न होगा और इन में रहे हुवे सात जीवों तील की फली में सात तीलपने उत्पन्न होंगे, तो यह मिथ्या है, क्यों की
48 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
34888 पन्नरहवा शतक 3488